गौरव हैं कि मानते नहीं !

सियासत

भाजपा में कांग्रेसी संस्कृति बहुत तेजी से बढ़ रही है. कांग्रेस मुक्त भारत का नारा बुलंद करते-करते दरअसल भाजपा कांग्रेस युक्त होती जा रही है. कम से कम नेताओं के आचरण से तो यही लगता है. बहरहाल, पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों की तरह डॉक्टर मोहन यादव को भी बार-बार इंदौर आना पड़ता है. मौजूदा मुख्यमंत्री के केस में ऐसा होना इसलिए स्वाभाविक है क्योंकि वो उज्जैन के ही हैं. उज्जैन में ऐसा एयरपोर्ट नहीं है जहां 24 घंटे लैंडिंग और टेक ऑफ होता हो.

जाहिर है मुख्यमंत्री को उज्जैन संभाग जाना होता है तो उनके लिए इंदौर आना जरूरी हो जाता है क्योंकि विमानतल इंदौर में ही है. बहरहाल, जब मुख्यमंत्री इंदौर आते हैं तो स्वाभाविक रूप से उन्हें विमानतल पर लेने नगर भाजपा अध्यक्ष और महापौर पहुंचते हैं. यह प्रोटोकॉल के हिसाब से बिल्कुल सही है. महापौर नगर के प्रथम नागरिक हैं जबकि नगर संगठन के प्रमुख नगर अध्यक्ष होते हैं.

इस नाते पुष्यमित्र भार्गव और सुमित मिश्रा का मुख्यमंत्री के साथ होना लगभग हक बनता है, लेकिन होता यह है कि जैसे ही मुख्यमंत्री आते हैं गौरव रणदिवे उनके आसपास हो जाते हैं. अनेक बार सुमित मिश्रा नजर ही नहीं आते. फिर मुख्यमंत्री को ढूंढना पड़ता है कि सुमित कहां है. हाल ही में ऐसा कम से कम दो बार हुआ. गौरव रणदिवे दरअसल पूर्व कांग्रेसी हैं. एक जमाने में वो भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन में सक्रिय थे, कैलाश विजयवर्गीय उन्हें अभाविप में लेकर आए.

तेज तर्रार गौरव जल्दी ही अभाविप से भाजयुमो में आ गए और यहां कैलाश विजयवर्गीय द्वारा ही प्रमोट किए गए. उन्हें नगर अध्यक्ष बनाने में भी श्री विजयवर्गीय का ही हाथ था. बाद में गौरव कैलाश विजयवर्गीय के विरोधी खेमे में चले गए. उन्हें उम्मीद थी कि संगठन उनके परफॉर्मेंस को देखते हुए फिर से मौका देगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बहरहाल, गौरव रणदिवे मुख्यमंत्री के आसपास नजर आकर मानो यह कह रहे हो कि मुझे कब निगम मंडल में एडजस्ट किया जाएगा? हालांकि यह तय है कि गौरव रणदिवे संगठन या सत्ता में प्रमोट जरूर किए जाएंगे क्योंकि नगर भाजपा अध्यक्ष रहते हुए वाकई उनका परफॉर्मेंस ए प्लस केटेगिरी का था.

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