
आम जनों से लगातार बनती जा रही दूरियां संवाद स्थापित करने पर बल, अमिलिया घाटी की घटना चर्चाओं में
नवभारत न्यूज
सिंगरौली 18 फरवरी। जिले में पिछले कुछ वर्षो से आम जनता एवं अधिकारियों की बीच की दूरियां लगातार बढ़ती जा रही है। इसके पीछे एक नही अनेक कारण गिनाये जा रहे है।
प्रबुद्धजन मान रहे है कि आमजनों से संवाद नही होगा तो दोनों के बीच गहरी खाईयां बनती जायेंगी। इसका जीता-जागता उदाहरण अमिलिया घाटी-गड़ाखाड़ में तोड़फोड़ की आगजानी की घटना है। माना जा रहा कि विवाद रोकने मेें पुलिस फेल रही है। जिला मुख्यालय से घटना स्थल की दूरी अधिकतम 35 किलोमीटर है। फिर भी एसपी 5 घण्टे में पहुंचे थे। गौरतलब है कि जिले के चितरंगी विधानसभा क्षेत्र के अलावा देवसर एवं सिंगरौली विधानसभा का क्षेत्र अधिकांंश हिस्से में औद्योगिक कम्पनियां स्थापित हो रही हैं। भूमि अधिग्रहण के बाद विस्थापन, बेरोजगारी एक जटिल समस्या बन गई है और इस ज्वलंत समस्या का हल निकालने में जिला प्रशासन अब तक असफल रहा है। इसके बारे में प्रबुद्धजन नागरिक मानते हंै कि विस्थापितोंं एवं जिले के प्रशासनिक अधिकारियों के बीच संवाद की कमी है। वर्तमान में जिले के आलाधिकारी भिड़ को देख उनके बीच जाना नही चाहते और न ही उनकी समस्यों को सुनने के लिए दिलचस्पी नही रखते है। यहा तक की विस्थापन एवं रोजगार से जुड़े आवेदन पत्रों को ठण्डे बस्ते में डाल देते है। कहने के लिए प्रत्येक मंगलवार को कलेक्ट्रेट एवं एसपी दफ्तर में जनसुनवाई आयोजित की जाती है। जनसुनवाईयों में लोगों के आवेदनों को कितनी तरजीह मिलती है। इसे आलाधिकारी ही बता पायेंगे। लेकिन लोगों के जुवान पर यही चर्चा है कि जनता एवं अधिकारियों एवं संवाद की कमी के चलते लगातार खाईयां बढ़ती जा रही है। फिलहाल अमिलिया घाटी एवं गड़ाखाड़ अग्निकाण्ड को लेकर जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर लोग तरह-तरह के सवाल खड़े कर रहे है।
हक मांगने पर एफआईआर की धमकी
सिंगरौली सिंगापुर बने या ना बने यह आने वाला वक्त बताएगा लेकिन जिले में लगातार हो रहे विस्थापन और हादसों सहित बढ़ते प्रदूषण को लेकर लोगों के नजरों से अधिकारी और जनप्रतिनिधि उतर रहे हैं जिम्मेदारों के प्रति आम लोगों के सीने में जो नॉरेटिव सेट हो रहा है वह किसी ज्वाला से कम नहीं है। यदि समय रहते अधिकारी और जनप्रतिनिधि आम जनमानस के नब्ज को नहीं पकड़ा तो वह दिन दूर नहीं जब जिला प्रशासन और सरकार को बड़ी चुनौती मिले तो आश्चर्य नहीं होगा। जिले में कई ऐसे अधिकारी हैं जो खुद ही मियां मि_ू बन गए हैं और अपने पुराने कार्यकाल का खुद प्रवचन देते हैं और अपनी उपलब्धियां गिनाते हैं। लेकिन वे अभी भी सिंगरौली के दर्द और नब्ज को समझने मैं कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। यदि कोई विस्थापित परिवार अपने हक मागने के लिए धरना प्रदर्शन करता है। तो उसे हक दिलाने के बदले एफआईआर दर्ज करने की धमकिया दी जाती है।
