भारतीय सिनेमा के पितामह दादा साहब फाल्के की याद में

नयी दिल्ली, 16 फरवरी (वार्ता) भारतीय सिनेमा के साहसी और दूरदर्शी कहानीकारों में से एक दादा साहब फाल्के ने आज ही की तारीख यानि 16 फरवरी, 1944 में नासिक में अपनी आखिरी सांस ली थी।
गौरतलब है कि 30 अप्रैल, 1870 को ब्रिटिश भारत के त्रयंबक में जन्मे धुंडिराज गोविंद ने भारत में एक ऐसी कला को जन्म दिया, जो आज हर भारतीय के दिल पर राज करती है। वह अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ गये हैं, जो आज भी करोड़ों लोगों के सपनों को आकार देता है। उस दौर में जब सिनेमा अधिकांश लोगों के लिए एक अजूबा था, दादा साहब फाल्के ने वहां संभावनाएं देखीं। 1910 में ईसा मसीह के जीवन पर आधारित एक मूक फिल्म से प्रेरित होकर, उन्होंने भारतीय कहानियों, मिथकों, किंवदंतियों को रुपहले पर्दे पर लाने का संकल्प लिया। वह इस नई कला को सीखने के लिए लंदन गए और एक साधारण कैमरे तथा एक ऐसे दृढ़ संकल्प के साथ लौटे जिसने भारतीय संस्कृति को हमेशा के लिए बदल दिया।

दादा साहब ने 1913 में, महीनों के प्रयोगों और भारी बाधाओं को पार करने के बाद ‘राजा हरिश्चंद्र’ रिलीज की, जिसे व्यापक रूप से भारत की पहली पूर्ण-लंबाई वाली स्वदेशी फीचर फिल्म के रूप में मान्यता प्राप्त है। आधुनिक स्टूडियो या प्रशिक्षित अभिनेताओं के बिना फिल्माए गए इस फिल्म ने दर्शकों की कल्पनाओं को जीत लिया और दुनिया को यह बता दिया कि भारत के पास चलती-फिरती तस्वीरों के माध्यम से सुनाने के लिए अपनी एक कहानी है। लगभग दो दशकों के दौरान, उन्होंने दर्जनों फिल्मों का निर्देशन, निर्माण, लेखन, संपादन किया और यहाँ तक कि वेशभूषा और सेट भी डिजाइन किए। ‘मोहिनी भस्मासुर’, ‘लंका दहन’ और ‘श्री कृष्ण जन्म’ जैसी फिल्मों के माध्यम से, श्री फाल्के ने भारतीय संस्कृति के जीवंत महाकाव्यों को पर्दे पर उतारा। उन्होंने ऐसे स्पेशल इफेक्ट्स और ट्रिक फोटोग्राफी का उपयोग किया जिसने टॉकीज (बोलती फिल्मों) के आगमन से बहुत पहले ही दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया था।

फिर भी, अपनी तमाम प्रतिभा के बावजूद, दादा साहब के अंतिम वर्ष कठिनाइयों से भरे रहे। बोलती फिल्मों के उदय और बदलती पसंद के साथ, इस अग्रणी कलाकार की चमक फीकी पड़ने लगी और गुमनामी के बीच उनका निधन हो गया। दूरदर्शियों के प्रति दयावान रहने वाले समय ने इतिहास के पन्नों में उनका स्थान मजबूती से स्थापित कर दिया। फिल्म जगत में उनके महान योगदान को सम्मानित करने के लिए, सरकार ने 1969 में ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ की स्थापना की। देश का यह सर्वोच्च सिनेमा सम्मान हर साल उन कलाकारों को दिया जाता है जिनके जीवन भर के कार्य ने भारतीय सिनेमा को आकार दिया है। आज, बॉलीवुड से लेकर क्षेत्रीय सिनेमा तक, समानांतर फिल्मों से लेकर वैश्विक प्रस्तुतियों तक भारतीय पर्दे पर दिखाई जाने वाली हर कहानी में दादा साहब फाल्के की भावना की गूँज सुनाई देती है।

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