भोपाल,03 जनवरी (वार्ता) मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि कला हमारे समाज, हमारी संस्कृति का प्रतिबिंब है। इसे बढ़ावा देना हमारी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। कला एक साधना और कलाकार एक साधक है। कला साध्य भी है और आराध्य भी है।
डाॅ़ यादव ने आज यहाँ एनसीईआरटी परिसर के कला मंडपम में संस्कृति और कला के अनूठे संगम राष्ट्रीय कला उत्सव का शुभारंभ दीप प्रज्जवलित कर किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि कला हमारे समाज, हमारी संस्कृति का प्रतिबिंब है। इसे बढ़ावा देना हमारी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। कला एक साधना और कलाकार एक साधक है। कला साध्य भी है और आराध्य भी है। कला ही समाज को अलंकृत करती है। उन्होंने राज्य सरकार द्वारा कलाकारों और सांस्कृतिक संस्थाओं को हर संभव समर्थन देने की बात कही और कला के संरक्षण और संवर्धन पर जोर दिया।
उन्हाेंने भगवान श्रीकृष्ण का उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण 64 कलाओं और 14 विधाओं में निपुण थे। वे ललित कलाओं में पारंगत थे। वे रागी थे, अनुरागी थे, धर्म की स्थापना के लिए इस धरा पर आये परम योगी थे। यौगिक क्रियाओं के प्रवर्तक श्रीकृष्ण सच्चे अर्थों में योगिराज थे। उन्होंने कहा कि अनेकता से एकता भारत की विशेषता है। हमें अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर नाज़ करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यह उत्सव भारत सरकार द्वारा वर्ष 2015 से प्रारंभ किया गया यह एक अनूठा कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों की कलात्मक प्रतिभा को विकसित करना और भारतीय कला एवं शिल्प की धरोहर को संरक्षित तथा यथावत रखना है। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक परंपरा को विद्यार्थियों में प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 शिक्षा के माध्यम से कला और संस्कृति को बढ़ावा देने पर बल देती है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीय कला एवं संस्कृति का संवर्धन न केवल राष्ट्र, बल्कि प्रत्येक नागरिक के लिए भी महत्वपूर्ण है। कला एवं संस्कृति विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों और नैतिकता की भावना को विकसित करती है, जिससे वे मशीनी होने की अपेक्षा संवदेनशील मनुष्य बन पाते हैं। कला की कोई भी विधा हो, यह अधिगम का एक सशक्त माध्यम है।
उन्होंने कहा कि कला चाहे नृत्य हो, गायन हो, वादन हो, चित्रण हो, शिल्पकला या अन्य कोई भी विधा हो अथवा स्थानीय,पारम्परिक खेल-खिलौने हों, ये सभी विधाएं विद्यार्थियों के शारीरिक, मानसिक, वैचारिक, सामाजिक, भावनात्मक और व्यावहारिक विकास में वृद्धि करती हैं। कला उत्सव, हमारे विद्यार्थियों को एक ऐसा मंच प्रदान कर रहा है, जहाँ वे संपूर्ण भारत के सांस्कृतिक रूप को समग्रता में अनुभव कर सकते हैं। कला उत्सव में अलग-अलग राज्यों से जुड़े छात्र-छात्राओं का परस्पर संवाद उन्हें संपूर्ण भारत से जुड़ाव की अनुभूति कराता है।
इस मौके पर प्रदेश के स्कूल शिक्षा एवं परिवहन मंत्री उदय प्रताप सिंह ने देश के विभिन्न अंचलों से आये बाल कलाकारों का उत्साहवर्धन करते हुए कहा कि यह कला उत्सव बाल कलाकारों को उनकी प्रतिभा की अभिव्यक्ति/प्रदर्शन का मंच प्रदान करता है। उन्होंने आल्हादित होकर कहा कि आज हमारे बच्चे ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल, संस्कृति से जुड़कर अपनी मेधा से देश का नाम रोशन कर रहे हैं। बाल कलाकार अपनी कला को ओर अधिक निखारें। पूरा क्षितिज उनका है, भविष्य उन्हीं का है।
