सौम्य कूटनीति के तहत राहुल ने दिया दूरगामी संदेश

नई दिल्ली, लोकसभा में नेताप्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के साथ चाय पर चर्चा और दीपावली मंगल मिलन समारोह महज एक पारंपरिक सामाजिक औपचारिकता नहीं था, बल्कि इसे भविष्य की सियासी बिसात पर राहुल का रणनीतिक तौर पर नपा-तुला मनोवैज्ञानिक और संगठनात्मक दांव माना जा रहा है.

राजनीतिक जानकारों की मानें तो सतही तौर पर भले ही इस आयोजन को त्योहार की शुभकामनाओं के आदान-प्रदान का नाम दिया गया, परंतु इसके अंतर्निहित राजनीतिक निहितार्थ सीधे तौर पर सत्ताधारी दल भाजपा, विपक्षी सहयोगियों, पार्टी के भीतर के असंतुष्टों और सरकार विरोधी मोर्चे को एक नई दिशा देने के लिए तैयार किए गए थे.

राजनीतिक रणनीति के चश्मे से देखें तो इस आयोजन का सबसे पहला और मुखर प्रहार केंद्र सरकार के खिलाफ चल रही मोर्चेबंदी को वैचारिक व मनोवैज्ञानिक संबल देना था. रामलीला मैदान की वोट बचाओ, देश बचाओ रैली और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ शुरू की गई जन महाभियोग की मुहिम के तुरंत बाद नेताओं का इस तरह अनौपचारिक माहौल में जुटना एक सोची-समझी निरंतरता का हिस्सा है. राहुल गांधी ने औपचारिकताओं की दीवार को तोड़कर चाय की चुस्कियों के बीच वरिष्ठ नेताओं को यह स्पष्ट संदेश दिया कि चुनावी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख का मुद्दा केवल चुनावी रैलियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे हर स्तर पर कांग्रेस के विमर्श का मुख्य केंद्र बिंदु बने रहना होगा. यही वजह है कि इस मिलन ने आगामी 26 नवंबर को संविधान दिवस के अवसर पर दिल्ली में होने वाले व्यापक शक्ति प्रदर्शन की पृष्ठभूमि तैयार कर दी है, जिससे सरकार विरोधी आंदोलन को एक नई धार मिलना तय है.

इसके साथ ही राजनीतिक जानकार बता रहे हैं कि यह समारोह कांग्रेस की आंतरिक एकजुटता का एक ऐसा जीवंत घोषणापत्र था, जिसने विरोधियों के उस नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जिसमें कांग्रेस को गुटबाजी से त्रस्त दिखाया जाता है. अशोक गहलोत, दिग्विजय सिंह, हरिश रावत,भूपेश बघेल और भूपेंद्र सिंह हुड्डा जैसे कद्दावर क्षत्रपों को एक साथ एक ही प्रांगण में लाकर केंद्रीय नेतृत्व ने भाजपा को यह कड़ा संदेश दिया कि संकट के समय संगठन पूरी ताकत से एक सुर में खड़ा है. यह शक्ति प्रदर्शन केवल प्रतिद्वंद्वियों के लिए ही नहीं, बल्कि इंडिया गठबंधन के उन क्षेत्रीय सहयोगियों के लिए भी एक रणनीतिक संदेश था जो अक्सर कांग्रेस की सांगठनिक क्षमता पर सवाल उठाते रहते हैं. राहुल गांधी ने इस जमावड़े के जरिए यह साफ कर दिया कि भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर बनने वाले किसी भी मोर्चे की धुरी और निर्विवाद नेतृत्व केवल और केवल कांग्रेस ही रहेगी. इस अनौपचारिक संवाद का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गहरा आयाम उन नेताओं की तरफ केंद्रित था जो पिछले कुछ वर्षों में या तो पार्टी की मुख्यधारा से अलग हो गए थे या फिर पराजय के दौर में सुस्त होकर घर बैठ गए थे. राहुल गांधी ने इस आयोजन में सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी यानी सौम्य शक्ति कूटनीति का परिचय देते हुए कई वरिष्ठ नेताओं से व्यक्तिगत स्तर पर संवाद भी स्थापित किया. इसलिए कहा जा रहा है कि दीपावली के इस पावन पर्व को कांग्रेस ने एक नए राजनीतिक वर्ष की शुरुआत के रूप में परिभाषित किया, जिसने सुस्त पड़े कार्यकर्ताओं और नेताओं में नई ऊर्जा का संचार करने का काम किया है. इतना ही नहीं इस बैठक से उन नेताओं को परोक्ष लेकिन बेहद सख्त संदेश मिल चुका है जो इस नए सांगठनिक रोडमैप के साथ कदमताल नहीं मिला रहे थे. साथ ही पार्टी छोड़कर जा चुके नेताओं को भी यह अहसास कराया गया कि उनके जाने से कांग्रेस कमजोर होने के बजाय और अधिक आक्रामक और पुनर्जीवित होकर उभरी है. जानकार बता रहे हैं कि भविष्य के रोडमैप की दृष्टि से इस आयोजन के गर्भ से यह स्पष्ट संदेश निकला है कि कांग्रेस जहां एक तरफ पार्टी के आंतरिक अंतर्विरोधों को समाप्त कर आगामी राज्यों के विधानसभा चुनावों में पूरी एकजुटता से उतरेगी, वहीं दूसरी तरफ नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल गांधी अपनी आक्रामकता को और तीखा करेंगे.

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