
विंध्य की डायरी
डॉ संजय पयासी
आजादी के बाद से खुली आँखों से सपने देखने के आदी हो चुके विंध्य में तेजी से विकास के नाम पर कई प्राधिकरण का गठन किया गया है. वर्षो बाद भी जानकारों को यही कहते सुना जाता है कि अपने विकास के लिए गठित प्राधिकरण से सिर्फ नेताओँ और अधिकारियों की महत्वाकांक्षा पूरी होती है. जनता तो सपनों को हकीकत में बदलने का इंतजार ही करती रहती है. पिछले दिनों विंध्य विकास प्राधिकरण के पदाधिकारियों के बीच भी कुछ ऐसा ही हुआ.राजनीति के मंजे खिलाड़ी पूर्व विधायक पंचू लाल प्रजापति ने राजनीति के नए खिलाड़ियों के खेल को पहले ही भाप कर ऐसा हो-हल्ला मचाया कि उन्हें शांत करने के लिए मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और प्रदेशाध्यक्ष हेमन्त खण्डेलवाल को सामने आना पड़ा.प्राधिकरण में सीईओ की नियुक्ति को लेकर उठे विवाद में बताया जा रहा है कि इस मामले में उन्हीं के क्षेत्र के उपाध्यक्ष अजय सिंह का हस्ताक्षेप उन्हें नागवार गुजरा. मामला शिकवा शिकायत तक पहुच गया.हालांकि विकास के लिए गठित इस प्राधिकरण के माध्यम से क्या विकास हुआ , यह तो कोई नहीं बता सकता.गाड़ियों में कितने का डीजल-पेट्रोल डाला गया इसकी फाइलों की चर्चा जरूर सुनाई देती है.
नेताजी की दो टूक
विंध्य में कांग्रेस के कद्दावर नेता पूर्व मंत्री,पूर्व नेता प्रतिपक्ष वर्तमान विधायक पूर्व मुख्यमंत्री के पुत्र अजय सिंह राहुल ने पिछले दिनों सिंगरौली क्षेत्र के कांग्रेस नेताओ को संगठित करने के लिए प्रवास किया.पहले
सिंगरौली क्षेत्र में पर्याप्त राजनैतिक हस्ताक्षेप रखने वाले श्री सिंह अपने पारिवारिक कारणों से
सिंगरौली में अपना हस्तक्षेप सीमित कर चुके हैं, इसके बावजूद संगठन की सौपी गई जिम्मेदारी और कुछ स्थानीय नेताओं के बुलावे पर जब पहुँचे तो उन्होंने कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच खुलकर कहा कि एकजुट होकर चुनाव लड़े कांग्रेस, वरना और हालात बिगड़ेंगे बिना किसी चुनावी वातावरण के कही गई उनकी इस बात को स्थानीय लोग भविष्य का राजनैतिक संकेत मान रहे हैं. हालांकि उनके और पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल के बीच अंदुरुनी खींचतान सर्वविदित है. विंध्य में कई हिस्सों में बंटी कांग्रेस को जोड़ने की कोई कोशिश ठोस रूप में नजर नहीं आ रही है. हालांकि बदले माहौल में नई पीढ़ी फिलहाल इस प्रकार की परंपरा का हिस्सा बनते कम ही नजर आ रही है. वरिष्ठों का सम्मान तो करती है पर लगाव और अंतरंगता मंच के बाद कम ही देखने को मिलती है.
भाजपा स्थानीय मुद्दों से दूर
जनता के बीच रह कर उससे जुड़े मुद्दे उठाना भाजपा का शगल रह है, लेकिन हाईटेक हो चुकी पूरी व्यवस्था में स्थानीय स्तर पर पार्टी राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर से मिलने वाली गाइडलाइन पर गतिविधियां संचालित करने तक सीमित रह गई है. कहने के लिए पार्टी हर दिन किसी न किसी कार्यक्रम का आयोजन करती है.उसमें स्थानीय महत्व का मसला कम ही शामिल होता है. इस प्रकार के प्रयासों से जनता के बीच बन रही दूरी उसके लिए आने वाले समय में घातक साबित हो सकती है. हालांकि हर बिगड़ी परिस्थिति को संभालना नेताओं को खूब आता है , हो सकता है आने वाले समय में इस प्रकार की कमी को दूर करने के लिए पार्टी के पास कोई बड़ा कार्यक्रम हो.
