सतना: सनातन परंपरा में संगीत,कला और संस्कृति की अधिसठाती देवी के रूप में माँ शारदा को पूजा जाता है. मैहर में विराजी माता का ही प्रभाव रहा कि संगीत सम्राट उस्ताद अल्लाउद्दीन खाँ ने अपने घराने का ठिकाना मैहर को ही बनाया.त्रिकूट पर्वत के शिखर में विराजी माँ शारदा की आराधना के लिए नवरात्रि में प्रति वर्ष लाखों श्रद्धालु मैहर पहुचते हैं. कहा जाता है कि कला और संस्कृति की देवी का देश मे कोई दूसरा मंदिर नहीं है.यही वजह है कि उस्ताद अलाउद्दीन खाँ ने मैहर आने के बाद फिर कभी अपना ठिकाना कही और नही बनाया. उनको जानने वाले बताते हैं कि पांच वक्त की नमाज अदा करने वाले बाबा सुबह उठने के बाद सबसे पहले माता को प्रणाम करते थे.इसी लगाव के चले उन्होंने अपना निवास मदीना भवन ठीक माता के मंदिर की सीध में बनवाया था.भारतीय शास्त्रीय संगीत में तार वाद्य को नया स्वरूप देने वाले बाबा के शिष्यों में भारतरत्न पं-रविशंकर,पदम् विभूषण अली अकबर,पद्मश्री हरिप्रसाद चौरसिया,अनपूर्णदेवी जैसे दर्जनों कलाकार शामिल थे.
विक्रम संवत 559 का शिलालेख
पुरातत्व विभाग ने इसके पौराणिक पक्ष के बारे में बताया है कि मंदिर में एक ऐसा शिलालेख भी मिला है. जो विक्रम संवत 559 का है.6 सौ फीट ऊँचे त्रिकूट पर्वत की चोटी में विराजमान मॉ शारदा तक पहुँचने के लिए 1063 सीढ़ी हैं. इसके अलावा लोग वाहन व रोपवे से भी जा सकते हैं.
आल्हा-ऊदल की तपो स्थली
माता के परम भक्त बुंदेलखंड के वीर योद्धा आल्हा-ऊदल की तपो स्थली भी मैहर को माना जाता है. अभी भी मंदिर पहाड़ी के पीछे आल्हा तालाब है. मान्यता है कि अभी भी आल्हा प्रतिदिन मंदिर के पट खुलने के पहले माता की पूजा अर्चना करने आते हैं. लोकसंस्कृति का अहम अंग आल्हा गायन की शैली का विकास इन्ही ने किया था.
