डाइसेरोथ, हेगमैन और नागेल को दिया जाएगा 2026 का चिकित्सा नोबेल पुरस्कार

स्टॉकहोम, 05 अक्टूबर (वार्ता) कार्ल डाइसेरोथ, पीटर हेगमैन और जॉर्ज नागेल को प्रकाश-सक्रिय आयन चैनलों और ऑप्टोजेनेटिक्स से संबंधित खोजों के लिए 2026 का चिकित्सा क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई है।

करोलिंस्का इंस्टीट्यूट की नोबेल असेंबली ने सोमवार को इसकी घोषणा की। पुरस्कार तीनों वैज्ञानिकों को संयुक्त रूप से दिया गया है। 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर की पुरस्कार राशि तीनों के बीच बराबर बांटी जाएगी।

अमेरिका के हॉवर्ड ह्यूजेस मेडिकल इंस्टीट्यूट और स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े कार्ल डाइसेरोथ, जर्मनी के हम्बोल्ट विश्वविद्यालय के पीटर हेगमैन और वुर्जबर्ग विश्वविद्यालय के जॉर्ज नागेल को यह सम्मान “प्रकाश-सक्रिय आयन चैनलों और ऑप्टोजेनेटिक्स से संबंधित उनकी खोजों” के लिए दिया जाएगा ।

नोबेल समिति के अनुसार, कार्ल डाइसेरोथ का जन्म 1971 में हुआ और उन्होंने 1998 में पीएचडी तथा 2000 में एमडी की डिग्री स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से हासिल की। पीटर हेगमैन का जन्म 1954 में हुआ और उन्होंने 1984 में जर्मनी के मार्टिंसरीड स्थित मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर बायोकैमिस्ट्री से पीएचडी की। जॉर्ज नागेल का जन्म 1953 में हुआ और उन्होंने 1988 में फ्रैंकफर्ट विश्वविद्यालय से पीएचडी की। नोबेल समिति के अनुसार, ऑप्टोजेनेटिक्स ऐसी विधि है, जिसके माध्यम से अध्ययन किया जाता है कि जीवित मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिकाएं किस तरह स्मृतियों, भावनाओं और व्यवहार को आकार देती हैं। तीनों वैज्ञानिकों के शोध ने न्यूरोसाइंस के एक नये युग की नींव रखी है।

यह खोज एकल-कोशिका वाले शैवाल से शुरू हुई। पीटर हेगमैन और जॉर्ज नागेल ने शैवाल में एक विशेष प्रोटीन ‘चैनलरॉडॉप्सिन’ की खोज की। यह प्रोटीन नीली रोशनी पड़ने पर एक चैनल खोलता है, जिससे आवेशित आयन कोशिका के भीतर प्रवेश करते हैं और विद्युत संकेत उत्पन्न होता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि जिस भी कोशिका में यह प्रोटीन डाला गया, वह प्रकाश के प्रति संवेदनशील हो गयी।

इसके बाद कार्ल डाइसेरोथ ने चूहों की तंत्रिका कोशिकाओं में ‘चैनलरॉडॉप्सिन’ के जीन को पहुंचाया। नीली रोशनी डालने पर वह तंत्रिका संकेत उत्पन्न करने में सफल रहे। उन्होंने 2005 में इस शोध को प्रकाशित किया और दो साल बाद जीवित चूहों के दिमाग में इस प्रकाश-नियंत्रित स्विच का इस्तेमाल करने में सफलता हासिल की।

इस तरह प्रकाश की मदद से तंत्रिका संकेतों को नियंत्रित करने की विधि को ऑप्टोजेनेटिक्स कहा जाने लगा। इसके बाद यह तकनीक दुनियाभर में तेजी से प्रभावी हुई और शोधकर्ताओं ने इसके माध्यम से विशिष्ट स्मृतियों, भावनाओं तथा व्यवहार से जुड़ी तंत्रिका प्रणालियों का पता लगाया, जो तंत्रिका एवं मनोरोग संबंधी विकारों से संबंधित हैं।

नोबेल समिति के अनुसार, ऑप्टोजेनेटिक्स ने मस्तिष्क की कार्यप्रणाली की समझ को मौलिक रूप से बदल दिया है। चिकित्सा क्षेत्र में शोधकर्ता दृष्टिबाधित लोगों की दृष्टि बहाल करने के प्रयासों में भी इस विधि का इस्तेमाल कर रहे हैं।

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