भागीरथपुरा कांड सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि दशकों की अनदेखी का परिणाम

इंदौर। आखिरकार भागीरथपुरा दूषित पानी में मौतों को लेकर जांच आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक हो गई। आयोग की रिपोर्ट में महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं, उनमें आयोग ने माना है कि जिम्मेदारी उन अधिकारियों तक भी जाती है, जो क्षतिग्रस्त पाइपलाइनों को बदलने के लिए निविदाओं की प्रक्रिया, जांच, अनुमोदन और अंतिम रूप देने से सीधे जुड़े रहे है। एक महत्वपूर्ण बात रिपोर्ट में यह भी आई है कि महापौर के पास 66 दिन फाइल अनुमोदन के लिए पड़ी रही।

भागीरथपुरा कांड की हाई कोर्ट के निर्देश पर न्यायिक जांच की रिपोर्ट हाई कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड हो गई है। सेवानिवृत्त जस्टिस सतीश गुप्ता के एक सदस्यीय आयोग ने रिपोर्ट में बताया कि भागीरथपुरा में दूषित जल की घटना किसी एक लापरवाही का परिणाम नहीं है, बल्कि कई दशकों से विभिन्न स्तरों पर लगातार अनदेखी का सामूहिक परिणाम थी। इसकी जिम्मेदारी अलग-अलग प्राधिकरणों और विभिन्न पदों पर कार्यरत अधिकारियों की है।

आयोग के अनुसार इस मामले में जिम्मेदारी सामूहिक और समानांतर है। निर्माण के दौरान सबसे बड़ी कमी लंबे समय तक रखरखाव और निगरानी करने में अनदेखी तथा क्षतिग्रस्त लाइनों को बदलने में प्रशासनिक देरी हुई है। इसमें प्रशासनिक अधिकारियों ने मिलकर लापरवाही की ऐसी व्यवस्था बना दी थी कि भागीरथपुरा के लोगों को दूषित पेयजल की आपूर्ति हुई। दूषित पानी से आम जनता के 38 लोगों की मृत्यु और सैकड़ों लोग बीमार पड़ गए थे।

आयोग ने महापौर और एमआईसी को क्लीनचिट दी है, लेकिन भागीरथपुरा की नर्मदा लाइन के टेंडर का फाइल 66 दिन और कुल 89 दिनों तक स्वीकृति के लिए अटकी रहा या पड़ी रही, इसकी जिम्मेदारी अधिकारियों की बताई है कि उन्हें महापौर से तुरंत स्वीकृति लेना चाहिए थी।

आयोग ने कहा कि अलग-अलग समय पर कार्यपालन यंत्री, अधीक्षण यंत्री और अन्य इंजीनियरिंग अधिकारी नर्मदा विभाग में पदस्थ रहे है। जलापूर्ति तथा सीवरेज व्यवस्था की निगरानी एवं रखरखाव की जिम्मेदारी निभाते रहे है। अधिकारियों के कार्यकाल में लापरवाही निर्धारित करने के लिए विस्तृत जांच आवश्यक है , जिसमें पदस्थ अधिकारियों ने अपने कार्यकाल में वैधानिक और प्रशासनिक दायित्वों का उचित तरीके से निर्वहन किया या नहीं।

इसलिए आयोग ने माना कि विस्तृत विभागीय जांच आवश्यक है, ताकि संबंधित अवधि में पदस्थ अधिकारियों, उन्हें सौंपी जिम्मेदारियों, उनके द्वारा किए गए या नहीं किए गए कार्यों तथा लापरवाही, निष्क्रियता या कर्तव्य में चूक की पहचान की जा सके।

प्रमुख जिम्मेदार…….. एक नजर में 

1. तत्कालीन इंदौर विकास प्राधिकरण/इंदौर विकास प्राधिकरण के वे अधिकारी, इंजीनियर और तकनीकी अधिकारी जिम्मेदार हैं, जो 1990 से 1995 के बीच सीवरेज लाइन डालने की योजना, डिजाइन और क्रियान्वयन करने की बात की गई। साथ ही वे अधिकारी जो 1999 से 2004 के बीच सीवरेज पाइपलाइन बिछाने से जुड़े थे। उक्त कार्य CPHEEO मैनुअल के प्रावधानों के विपरीत किया गया।

2. इंदौर नगर निगम के वे अधिकारी, जिन्हें सीवरेज और पेयजल व्यवस्था के संचालन, रखरखाव और निगरानी की जिम्मेदारी दी गई थी, वे समय रहते बुनियादी ढांचे में हो रही खराबी को पहचानने, रोकने और ठीक करने में असफल रहे।

3. अधीक्षण यंत्री संजीव कुमार श्रीवास्तव, जो 2013 से 2026 तक लगातार पदस्थ रहे। भागीरथपुरा क्षेत्र की जलापूर्ति व्यवस्था एवं रखरखाव के सबसे वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी थे। श्रीवास्तव ने कमजोर पाइपलाइन नेटवर्क का पर्याप्त निरीक्षण, रखरखाव, समय पर पाइपलाइन बदलने निवारण और प्रभावी निगरानी तय नहीं की गई।

4. क्षतिग्रस्त पाइपलाइनों को बदलने के लिए टेंडर प्रक्रिया को अंतिम रूप देने में देरी हुई है। इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की प्रशासनिक देरी ने पाइप लाइन बदलने के कार्यों को टालने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। इससे अंततः दूषित जल की घटना का जोखिम बढ़ गया और 38 मौतें हुई।

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