हमें कब मिलेगा मंत्री का दर्जा…? 

.

महाकौशल की डायरी 

 

अविनाश दीक्षित 

 

महाकौशल सहित प्रदेश भर के उन नवनियुक्त पदाधिकारियों के सामने इन दिनों सबसे गंभीर चुनौती प्रशासनिक मशीनरी के साथ समन्वय स्थापित करने में आ रही है। मंत्री स्तर का प्रोटोकॉल न होने से नवनियुक्त पदाधिकारियों के पत्रों और दिशा-निर्देशों को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं दी जा रही है। कुछ नेता इसको लेकर असमंजस में हैं तो कुछ इसे प्रशासनिक लापरवाही मान रहे हैं। विभागीय स्तर पर जनसमस्याओं के निराकरण के लिए अफसरों पर वैसा प्रभाव नहीं बन पा रहा है जैसा पूर्ववर्ती कार्यकालों में देखा जाता था। क्षेत्र से आने वाले कार्यकर्ताओं को लगता है कि उनके नेता सरकार के शक्तिशाली अंग बन चुके हैं, जबकि धरातल पर अधिकारों की सीमाएं आड़े आ रही हैं।

उधर स्थानीय भाजपा संगठन के भीतर अब यह चर्चा तेजी से चल रही है कि क्या सरकार इन नियुक्तियों को केवल सांकेतिक रखना चाहती है या आने वाले समय में इनके कामकाज की समीक्षा करके प्रशासनिक ताकत सौंपने पर भी विचार करेगी। फिलहाल नवनियुक्त पदाधिकारियों को इंतजार के सिवा कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है।

जबलपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष के तौर पर संदीप जैन और उपाध्यक्ष के रूप में प्रशांत केसरवानी की ताजपोशी के बाद कार्यकर्ताओं में काफी उत्साह भी नजर आया था, दोनों नेताओं के समर्थक मान रहे थे कि अध्यक्ष और उपाध्यक्ष बनने के साथ ही उन्हें क्रमश: कैबिनेट और राज्यमंत्री का प्रोटोकॉल प्राप्त हो जाएगा। लेकिन हकीकत में प्रशासनिक आदेश में हो रही लगातार देरी से जबलपुर के राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का नया दौर शुरू हो गया है। सामान्य तौर पर राज्य में परंपरा रही है कि प्रमुख संस्थाओं के अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री और उपाध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा अलग से अधिसूचना जारी कर तुरंत प्रदान कर दिया जाता है। किन्तु इस बार यह स्थापित प्रक्रिया ठंडे बस्ते में जाती दिखाई दे रही है। शासन स्तर पर अब तक इस संबंध में कोई ठोस नीतिगत कदम नहीं उठाया गया है। जिसको लेकर अब नवनियुक्त पदाधिकारी खुद अपने आप को थोड़ा हल्का मानने विवश हो रहे हैं। विदित हो कि करीब ढाई-तीन साल की लंबी जद्दोजहद के बाद नियुक्तियां की गईं थीं। इस कवायद में भाजपा के पूर्व जनप्रतिनिधियों, निष्ठावान कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ पदाधिकारियों को साधने का पूरा प्रयास किया गया था।

चहेतों को उपकृत करने बिछाया जा रहा जाल…

जबलपुर के जिला अस्पताल विक्टोरिया जहां मंडला डिंडोरी, शहपुरा, निवास, कुंडम सहित अन्य समीपी क्षेत्र के लोग बेहतर इलाज की आशा लेकर पहुंचते हैं लेकिन यहां उम्दा उपचार की जगह अस्पताल की अव्यवस्थाओं का शिकार होना पड़ता है। कभी ओपीडी पर्ची कटवाने तो कभी जांच करवाने में अस्पताल कर्मियों की हीलाहवाली मरीज और उनके परिजनों की तकलीफ और बढ़ा देती है। जिला अस्पताल के सूरते हाल क्या हैं, इसको इस बात से समझा जा सकता है कि गत दिवस कुछ मरीज सुबह से दोपहर बाद तक संबंधित जांच विभागों में डॉक्टर की प्रतीक्षा करते रहे मगर उनकी जांच से नहीं हो सकी। पीड़ितों के परिजनों ने जानकारी ली तो पता चला कि कई डॉक्टर अस्पताल के एक अन्य कक्ष में मौजूद तो रहे किंतु वह ऐसी गुप्त मीटिंग में व्यस्त रहे जो उपचार व्यवस्थाओं की जगह मनचाही पोस्टिंग से संबंधित थी। दरअसल अर्बन नोडल अधिकारी कार्यालय का यह वह कक्ष था जहां से विभिन्न स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर्स की तैनाती की जाती है। कक्ष में दिनभर अधिकारियों के साथ इन चहेतों की बैठकों का दौर चलता रहा जो कि कुछ घंटे में ही पूरे स्वास्थ्य विभाग में चर्चा का विषय बन गया। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री संजीवनी क्लिीनिकों में कलेक्टर राघवेंद्र सिंह और निगमायुक्त रामप्रकाश अहिरवार के निरीक्षण के दौरान सामने आई लापरवाही के चलते नोडल अधिकारी डॉ. अमजद खान सहित 7 को नोटिस जारी किया गया था। खबर वायरल हुई तो उन अधिकारियों के माथे में शिकन देखी गई जो अपने अपने चहेतों को विभाग में बैक डोर से एंट्री के लिए तमाम हथकंडे अपना रहे थे। दूसरी तरफ विभाग के इन अधिकारियों से परेशान, हताश और दु:खी कुछ कर्मियों ने सीएमएचओ डॉ. नवीन कोठारी से मुलाकात कर मौखिक रूप से शिकायत दर्ज कराई है। इस शिकायत से फिलहाल सीएमएचओ अभी खुद को दूर रखने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। इसके पीछे क्या राज छिपे हैं ये तो आगे ही पता चलेगा। कर्मचारियों ने आरोप लगाते हुए ये भी दर्द बयां किया कि विभागीय कमियों को छिपाने के लिए उन्हें टारगेट किया जा रहा है जबकि अधिकारी खुद अपना काम पूरा नहीं कर पा रहे हैं। दरअसल मामला स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से जुड़ा है जो उन कर्मचारियों को हटाने की फील्डिंग सेट करने में जुटे हैं जो सालों से विभाग को पूरी शिद्दत से सेवाएं देते आ रहे हैं। जिला अस्पताल विक्टोरिया के गलियारों में चर्चाएं ये भी व्याप्त रहीं कि जिले में एनसीडी और स्वास्थ्य योजनाओं में फिसड्डी होने पर ये अधिकारी अपनी लापरवाही और कमियों का ठीकरा निर्दोष कर्मचारियों पर फोड़ रहे हैं। अधिकारियों की सेटिंग कितनी कारगर साबित होती है या फिर चहेतों को बैकडोर एंट्री देने का खेल सफल होता है इस पर निर्णय कर पाना अभी बेहद मुश्किल है क्योंकि कर्मचारियों ने अब मुख्यालय स्तर पर ऐसे अधिकारियों की सूची बनाकर शिकायत करने की तैयारी कर ली है, ऐसे में पूरा मामला सुर्खियों में आ गया है।

Next Post

गुजरात के भुज, बिहार के बरौनी से चलेंगी नयी अमृत भारत एक्सप्रेस, रेलवे ने दी मंजूरी

Fri Sep 25 , 2026
नयी दिल्ली, 25 सितंबर (वार्ता) रेलवे ने गुजरात के भुज और बिहार के बरौनी से नयी अमृत भारत एक्सप्रेस चलाने का निर्णय लिया है। यह ट्रेन सप्ताह में तीन दिन चलेगी और गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार के महत्वपूर्ण स्थलों को जोड़ते हुए 2,532 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। […]

You May Like