मुंबई, 20 सितंबर (वार्ता) टाटा समूह की धारक कंपनी टाटा संस के अंदर नेतृत्व और शेयर बाजार में सूचीद्धता को लेकर छिड़े विवाद के बीच नोएल नवल टाटा की अध्यक्षता वाले टाटा ट्रस्ट्स ने रविवार को एक प्रेस बयान में कंपनी की सूचीबद्धता और एन चंद्रशेखन को फिर चेयरमैन बनाने को लेकर अपना विरोध दोहराया है।
टाटा ट्रस्ट्स टाटा संस के शेयरधारकों को प्रमुख समूह है और कंपनी के निदेशक मंडल ट्रस्ट के प्रतिनिधियों के अधिकार को निर्णायक मानता है।
टाटा ट्रस्ट ने कहा है कि 17 सितंबर की बोर्ड की बैठक में चेयरमैन के निर्णायक वोट के अधिकार के प्रयोग से ” किसी ऐसे प्रस्ताव को दोबारा ज़िंदा नहीं किया जा सकता जो शुरू में ही मंज़ूर नहीं हुआ हो।” श्री नोएल टाटा की अगुवाई में टाटा ट्रस्ट्स का तर्क है कि टाटा संस के निदेशक मंडल में किसी फैसले के एक लिए टाटा ट्रस्ट्स के प्रतिनिधियों के बहुमत से ही लिया जा सकता है और 17 तारीख की बैठक में ट्रस्टों के दो लोग थे तो बहुमत दो के एक पक्ष में होने से बनता न कि चेयरमैन के निर्णायक वोट के अधिकार से।
बयान में कहा गया है कि टाटा ट्रस्ट्स कंपनी में संविधान में ट्रस्टों के प्रतिनिधियों के इस अधिकार को सायरस मिस्त्री ( दिवंगत पूर्व चेयरमैन) के प्रकरण में राष्ट्रीय कंपनी विधि बोर्ड (एनसीएलटी) ने दमनकारी करार दिया था तो कंपनी ने उसे खुद चुनौती दी थी।
टाटा ट्रस्ट्स ने कंपनी को सूचीबद्ध कराने के प्रस्ताव पर कहा है, ”सवाल यह नहीं है कि कौन सा नियम टाटा संस को बेहतर ढंग से चलाता है या कौन व्यक्ति टाटा संस को बेहतर ढंग से चलाता है। बल्कि, सवाल यह है कि उन लाखों ज़रूरतमंद और वंचित भारतीयों की बात रखने के लिए कौन बचा है, जो एकसौ तीस से ज़्यादा सालों से टाटा ट्रस्ट के हर काम के केंद्र में रहे हैं।”
बयान में कहा गया है , ” टाटा संस के ‘आर्टिकल्स ऑफ़ एसोसिएशन’ (गठन के संविधान ) के तहत बोर्ड का कोई भी फ़ैसला सिर्फ़ डायरेक्टरों की गिनती के आधार पर नहीं लिया जा सकता। नियम यह है कि कोई भी फ़ैसला तब तक नहीं लिया जा सकता जब तक कि टाटा ट्रस्ट्स द्वारा मनोनीत निदेशकों में से कम से कम बहुमत का समर्थन न मिले; टाटा ट्रस्ट्स के पास कंपनी की लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। यह संविधान के तहत एक अलग शर्त है।”
बयान में कहा गया है कि इस समय कंपनी के बोर्ड में टाटा ट्रस्ट्स के दो प्रतिनिधि हैं। दो लोगों में बहुमत का मतलब दो होता है, एक नहीं। 17 सितंबर, 2026 को, ऐसे ही एक निदेशक ने प्रस्ताव के ख़िलाफ़ वोट दिया। इस तरह, कंपनी के संविधान के मुताबिक टाटा ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टरों का ज़रूरी समर्थन नहीं मिला। शर्त पूरी नहीं हुई, और इसलिए प्रस्ताव भी मंज़ूर नहीं हुआ।”
टाटा ट्रस्ट का मत है कि “चेयरमैन का निर्णकारी वोट तभी इस्तेमाल किया जा सकता है जब पूरे बोर्ड के स्तर पर वोटों की संख्या बराबर हो। यह टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों के बीच के मत पर लागू नहीं होता।”
टाटा ट्रस्ट ने कहा है कि कंपनी का कामकाज ठप हुआ था और न ही कोई गतिरोध पैदा हुआ। बोर्ड ने एक सवाल रखा, और कंपनी के संविधान ने उसका जवाब ‘नहीं’ में दिया।
बयान में कहा गया है कि कंपनी के अपने संविधान से मिले सुरक्षात्मक अधिकार का इस्तेमाल करना गतिरोध नहीं है; यह उस संविधान का वैसा ही काम करना है जैसा उसे काम करने के लिए लिखा गया था। बयान में कहा गया है, ” 17 सितंबर, 2026 को बोर्ड की बैठक में टाटा संस के चेयरमैन के तौर पर एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के प्रस्ताव को सही तरीके से मंज़ूर नहीं किया गया था और .. कानून की नज़र में, यह शुरू से ही अमान्य है।
टाटा ट्रस्ट्स ने कहा है कि ‘आर्टिकल्स ऑफ़ एसोसिएशन’ ऐसी चीज़ नहीं हैं जिनका फ़ायदा होने पर तो सहारा लिया जाए और फ़ायदा न होने पर उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया जाए। इसी संबंध में टाटा संस ऐसा रुख़ नहीं अपना सकती, क्योंकि वह पहले ही इसके उलट रुख़ अपना चुकी है और उच्चतम न्यायालय में जीत चुकी है। बयान में इसी संदर्भ में स्व. साइरस मिस्त्री को हटाए जाने से जुड़ी कार्यवाही का उल्लेख किया गया है। उसमें अनुच्छेद 104 बी और 121 के तहत किसी प्रस्ताव की मंजूरी के लिए निदेशक मंडल में ट्रस्ट के नुमाइंदा निदेशकों के ‘ समर्थन के अधिकार’ को एनसीएलटीने दमनकारी माना था और मिस्त्री खेमे ने उसे हटाने या सीमित करने की मांग की थी।
बयान में कहा गया है कि टाटा संस ने उस समय उसका विरोध किया था अब वह उस सुरक्षात्मक व्यवस्था से पीछे नहीं हट सकती जिसे बनाए रखने के लिए वह (एनएसीएलटी के निर्णय के विरुद्ध) उच्चतम न्यायालय गयी थी। बयान में कहा गया है, ‘ या तो वे (प्रावधान) कंपनी के संविधान में हैं या नहीं हैं। टाटा संस पहले ही देश की सबसे बड़ी अदालत को बता चुका है कि वे हैं।”
टाटा संस ने कहा है, ‘ यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि टाटा संस के चेयरमैन, जो कंपनी निदेशन के के ऊंचे मानक तय करने के लिए जानी जाने वाली कंपनी के है, कंपनी के संविधान की ऐसी बेतुकी व्याख्या के आधार पर दोबारा नियुक्ति का तर्क दे रहे हैं।”
बयान में कहा गया है कि एक काल्पनिक कमी को पूरा करने के लिए — सौ साल पुराने ढांचे को तोड़ना, ‘मक्खी मारने के लिए हथौड़ा चलाने’ जैसा है।”
टाटा ट्रस्ट ने इस तर्क को भी इस बयान में खारिज किया है कि कंपनी की लिस्टिंग ( शेयर बाजार में चढाये जाने) का स्वागत किया जाना चाहिए क्यों कि इससे कंपनी संचालन बेहतर होगा। बयान में कहा गया है, ‘ यह तर्क कंपनी निदेशन या संचालन में किसी ऐसी कमी की कल्पना करता मानता है जो असल में है ही नहीं।”
टाटा ट्रस्ट्स ने कहा कि लिस्टिंग से अलग, टाटा संस ने सालों से खुद को पब्लिक कंपनी के मानकों के हिसाब से चलाने का फैसला किया है। इसके अपने संविधान में पब्लिक कंपनियों पर लागू होने वाले प्रावधान शामिल हैं जिनमें स्वतंत्र निदेशक की नियुक्ति, ऑडिट कमिटी और नियुक्ति एवं पारितोषिक कमिटी के गठन, संबद्ध पाटिर्यों के साथ लेन-देन के नियमन और बारी बारी निदेशकों की सेवानिवृत्ति के रिटायरमेंट से जुड़े नियम के साथ ही शेयर बाजार में भेदिया सौदे रोकने के लिए आचार संहिता शामिल है।
