भोपाल। पर्युषण महापर्व के पावन अवसर पर आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने आर्जव धर्म की व्याख्या करते हुए श्रद्धालुओं से जीवन में सरलता, निष्पृहता और आत्मचिंतन अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य आत्मा के निकट पहुंचना और भीतर ऐसा परिवर्तन लाना है, जो आचरण में स्पष्ट दिखाई दे।
पंचायत समिति के मीडिया प्रभारी भविष्य जैन ने बताया कि आचार्य श्री ने कहा कि सच्चा धर्म केवल बाहरी धार्मिक क्रियाओं और अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। क्रोध, मान, माया और लोभ आत्मा के वास्तविक स्वरूप को ढक देते हैं। आध्यात्मिक प्रगति के लिए इन विकारों का क्रमशः त्याग आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि उपवास का अर्थ केवल भोजन का त्याग करना नहीं, बल्कि आत्मा के और निकट जाने का प्रयास करना है। इसी प्रकार णमोकार मंत्र का जाप भी आंतरिक आध्यात्मिक जागरूकता के साथ किया जाना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा कि धार्मिक साधना यश, सम्मान और भौतिक लाभ की इच्छा से मुक्त होनी चाहिए। उन्होंने टेढ़े-मेढ़े रास्ते का उदाहरण देते हुए कहा कि छल और कपट आध्यात्मिक यात्रा को लंबा और कठिन बना देते हैं। श्रद्धालुओं को गुरु और शास्त्रों द्वारा बताए मार्ग पर सरलता और निष्ठा से चलना चाहिए।
उन्होंने जैन सिद्धांत “परस्परोपग्रहो जीवानाम्” का उल्लेख करते हुए परस्पर सहयोग, करुणा और दूसरों को सांसारिक मोह के बंधनों से बचाने की भावना पर भी जोर दिया।
