ओडिशा के ग्राहम स्टेन्स हत्याकांड के दोषी दारा सिंह की सजा माफी याचिका खारिज

नयी दिल्ली, 17 सितंबर (वार्ता) ओडिशा सरकार ने वर्ष 1999 के चर्चित ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टुअर्ट स्टेन्स और उनके दो मासूम बेटों की नृशंस हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे रवींद्र कुमार पाल उर्फ दारा सिंह की सजा माफी और समयपूर्व रिहाई की याचिका को खारिज कर दिया है।

राज्य सरकार ने गुरुवार को उच्चतम न्यायालय को सूचित किया कि इस संबंध में 31 अगस्त 2026 को ही आधिकारिक आदेश पारित कर याचिका को निरस्त कर दिया गया था।

न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ के समक्ष राज्य के वकील ने सरकार के फैसले की जानकारी दी। इस पर ध्यान देते हुए न्यायालय ने याचिकाकर्ता रवींद्र पाल को अपनी लंबित याचिका में संशोधन करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया, ताकि वह राज्य सरकार के इस आदेश को अदालत में चुनौती दे सके। पीठ ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता जिन आधारों पर फैसले को चुनौती देना चाहता है, उनके साथ अपनी संशोधित याचिका दाखिल करे, जिसके बाद मामले की सुनवाई तीन सप्ताह बाद की जाएगी।

रवींद्र पाल ने ओडिशा अधिकारियों द्वारा उसकी समयपूर्व रिहाई के आवेदन पर फैसला लेने में हो रही अत्यधिक देरी को लेकर उच्चतम न्यायालय का रुख किया था। इससे पूर्व आठ सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकार को चेतावनी दी थी कि अगर अगली सुनवाई तक फैसला नहीं लिया गया, तो अधिकारियों को तलब किया जा सकता है। न्यायालय ने तब टिप्पणी की थी कि यह मामला दो साल से अधिक समय से लंबित है और इसे अनिश्चित काल के लिए नहीं लटकाया जा सकता।

इस मामले का दोषी दारा सिंह पिछले 26 वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद है। उसने ओडिशा सरकार की 19 अप्रैल 2022 की सजा माफी नीति का हवाला देते हुए जेल में बिताई गई अवधि और अपने सुधरे हुए आचरण के आधार पर रिहाई की मांग की थी। दारा सिंह को 22 जनवरी 1999 की रात ओडिशा के क्योंझर जिले के मनोहरपुर गांव में वाहन में सो रहे ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बेटों फिलिप (10 वर्ष) व टिमोथी (6 वर्ष) को जिंदा जलाकर मार डालने के अपराध में सजा सुनाई गई थी।

इस मामले में विशेष सीबीआई अदालत ने रवींद्र पाल (दारा सिंह) को मौत की सजा सुनाई थी, जबकि सह-दोषी महेंद्र हेम्ब्रम को उम्रकैद की सजा दी थी। बाद में उड़ीसा उच्च न्यायालय ने दारा सिंह की मृत्युदंड की सजा को उम्रकैद में बदल दिया था और हेम्ब्रम की उम्रकैद को बरकरार रखा था। इसके बाद 21 जनवरी 2011 को उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले को कायम रखते हुए माना था कि यह मामला ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ श्रेणी में नहीं आता है।

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