नयी दिल्ली, 09 सितंबर (वार्ता) ब्रिक्स शिखर सम्मेलन नजदीक आने के साथ दुनिया भर के शेयर बाजारों के कारोबारियों से लेकर प्रमुख केंद्रीय बैंकों के प्रमुखों तक सभी की नजर इस बात पर है कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं के इस समूह की बैठक में ऐसे कौन से कदम सामने आते हैं, जो वैश्विक व्यापार और वित्तीय लेनदेन में अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती दे सकते हैं।
डॉलर से दूरी बनाने की प्रक्रिया धीमी गति से आगे बढ़ रही है, लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ब्रिक्स देशों को दी गयी चेतावनी के बाद यह मुद्दा चर्चा में आ गया है। ट्रंप ने कहा है कि यदि ब्रिक्स देश वैश्विक व्यापार में डॉलर के प्रभुत्व को खत्म करने की कोशिश करते हैं, तो उन पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाया जा सकता है।
रूस, भारत और चीन में मुद्रा एवं व्यापार बाजारों का प्रबंधन करने वाले मंत्रियों और अधिकारियों ने बार-बार स्पष्ट किया है कि ब्रिक्स देश किसी भी तरह डॉलर के खिलाफ वैचारिक लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं। भू-राजनीतिक जोखिमों से व्यापार को बचाने के लिए उनकी नीतियों का व्यावहारिक असर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को सहारा देने वाली वित्तीय संरचना में धीरे-धीरे बदलाव के रूप में जरूर सामने आया है।
इस सप्ताह के अंत में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में डॉलर से दूरी बनाने के मुद्दे पर भले ही सीधे चर्चा न हो, लेकिन सम्मेलन से इतर देशों के बीच होने वाली बातचीत में मुद्रा विनिमय समझौतों और व्यापार व्यवस्था पर चर्चा होने की पूरी संभावना है। मूल सदस्य देशों भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के नेता आपस में तथा हाल में ब्रिक्स में शामिल हुए ईरान, सऊदी अरब, मिस्र, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात और इथियोपिया जैसे देशों के नेताओं के साथ कई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ताएं कर सकते हैं।
साल 2024 में ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार का अनुमानित मूल्य 1.17 लाख करोड़ डॉलर था और इसके औसतन 13 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ने का अनुमान है। कुल वैश्विक निर्यात में ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी करीब 24 प्रतिशत है।
भारत-रूस के बीच रुपये-रूबल समझौते और चीन द्वारा डॉलर के बजाय युआन में कारोबार करने की कोशिश जैसे ब्रिक्स देशों के कदमों से अब तक अंतरराष्ट्रीय व्यापार के निपटान में डॉलर की हिस्सेदारी में कोई महत्वपूर्ण तेजी से गिरावट नहीं आयी है।
साल 2026 तक वैश्विक व्यापार के करीब 54 प्रतिशत चालान और उनका निपटारा डॉलर में होते हैं और यह अनुपात कई वर्षों से लगभग इसी स्तर पर बना हुआ है। वास्तव में वर्ष 2000 में यह करीब 50 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर 54 प्रतिशत हो गया है।
व्यापार के चालान और निपटान में डॉलर की स्थिति स्थिर बनी हुई है, लेकिन विदेशी मुद्रा भंडार में उसकी हिस्सेदारी में लगातार और स्पष्ट गिरावट आयी है। वर्ष 2000 में दुनिया के सभी देशों के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का करीब 71 प्रतिशत डॉलर में था। 2026 तक यह घटकर लगभग 57 प्रतिशत रह गया, यानी एक चौथाई सदी में 14 प्रतिशत की कमी आयी है।
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति बनाने वाली टीम के एक सदस्य ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर कहा, “यह स्पष्ट संकेत है कि कई देशों के केंद्रीय बैंक बड़ी मात्रा में डॉलर रखने से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिमों पर विचार कर रहे हैं और अन्य मुद्राओं या अंतिम सुरक्षित विकल्प यानी सोने में निवेश कर इस जोखिम को बांट रहे हैं।”
डॉलर पर भरोसे में यह कमी अब अमेरिका में केंद्रीय बैंकों द्वारा सोना रखने के मामले में भी दिखाई दे रही है। नीदरलैंड के केंद्रीय बैंक ने इस वर्ष मार्च से अगस्त के बीच उत्तर अमेरिका से करीब 86 टन सोना लंदन स्थानांतरित किया, जिसकी कीमत 10 अरब डॉलर से अधिक बतायी गयी है।
इससे पहले जनवरी 2026 में फ्रांस ने अमेरिका में रखा 129 टन सोना बेच दिया था, जो उसके कुल भंडार का करीब पांच प्रतिशत था। इस बिक्री से प्राप्त राशि से फ्रांस ने यूरोप में सोना खरीदा और उसे अपने केंद्रीय बैंक की तिजोरियों में रखा। यह कदम करीब नौ वर्ष पहले राष्ट्रपति ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान जर्मनी के बुंडेसबैंक द्वारा उठाए गए कदम के समान है, जब उसने 300 टन सोना फ्रैंकफर्ट स्थित अपनी तिजोरियों में स्थानांतरित किया था।
क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने मंगलवार को मौजूदा स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा कि ब्रिक्स किसी डॉलर से दूरी बनाने की नीति के पक्ष में नहीं है, लेकिन उसके कई सदस्य देश प्रतिबंधों के कारण डॉलर में लेनदेन नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि ये देश “वही कर रहे हैं जो उनके राष्ट्रीय हितों के अनुरूप है।” उन्होंने यह भी कहा कि “अमेरिका की कार्रवाइयां ही डॉलर में भरोसा कमजोर कर रही हैं।”
श्री पेस्कोव ने कहा कि पश्चिमी वित्तीय बाजारों से प्रतिबंधों के कारण रूस के बढ़ते अलगाव की समस्या से निपटने के लिए मॉस्को ने वैकल्पिक भुगतान माध्यम विकसित किए हैं।
भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से जटिल है, क्योंकि नयी दिल्ली एक ओर दुनिया के सबसे बड़े रूसी कच्चे तेल खरीदारों में शामिल हो गया है, वहीं दूसरी ओर वह पश्चिमी बाजारों, प्रौद्योगिकी और पूंजी तक अपनी पहुंच बनाए रखना चाहता है।
यहीं ब्रिक्स की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। इस समूह के पास न तो कोई साझा मुद्रा है, न साझा केंद्रीय बैंक और न ही यूरोजोन जैसी संस्थागत एकजुटता। हालांकि, यह सदस्य देशों के बीच राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार निपटाने और उन्हीं मुद्राओं में मुद्रा विनिमय समझौते करने की सुविधा देता है।
ये छोटे-छोटे बदलाव राष्ट्रीय मुद्राओं को द्विपक्षीय और कुछ बहुपक्षीय व्यापार निपटान में अधिक उपयोगी बना रहे हैं। इससे भुगतान प्रणालियों में विविधता बढ़ रही है। इन लेनदेन का मौजूदा पश्चिमी नियंत्रण वाली वित्तीय निपटान व्यवस्था के दायरे से बाहर होना वाशिंगटन के लिए विशेष चिंता का विषय है।
