शहरी इलाकों में 70 फीसदी, गांवों में 23 प्रतिशत परिवार खाना बनाने के लिए सिर्फ एलपीजी पर निर्भर: रिपोर्ट

नयी दिल्ली, 07 सितंबर (वार्ता) प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से देश के गरीब परिवारों के बीच रसोई गैस (एलपीजी) की उपलब्धता और स्वीकार्यता तेजी से बढ़ी है, लेकिन इसे और बढ़ावा देने की जरूरत है।

‘काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर’ (सीईईडब्ल्यू) ने सोमवार को जारी तीन नये अध्ययनों के हवाले से यह बात कही है। सर्वेक्षण में पाया गया कि ग्रामीण परिवारों में 73 प्रतिशत प्रतिभागियों ने पिछले 90 दिन में एलपीजी का उपयोग किया, लेकिन सिर्फ 23 प्रतिशत पूरी तरह से इस पर निर्भर रहे। आधे से अधिक परिवार आज भी लकड़ी को खाना पकाने के लिए मुख्य ईंधन बनाये हुए है। एलपीजी उपभोक्ताओं में से सिर्फ 47 प्रतिशत को घर तक डिलीवरी मिलती है। रीफिल की कीमत और अंतिम छोर तक रीफिल की डिलीवरी यहां सबसे बड़ी चुनौतियां हैं।

शहरी अनौपचारिक बस्तियों के परिवारों में एलपीजी का उपयोग ज्यादा पाया गया है। शहरों में 70 प्रतिशत गरीब परिवार सिर्फ इसी का उपयोग करते हैं। लेकिन जिनके पास औपचारिक कनेक्शन नहीं है, उनमें से 31 प्रतिशत का कहना है कि पते का प्रमाणपत्र या दूसरे दस्तावेजों की कमी के कारण उन्हें कनेक्शन नहीं मिल सका। इसका परिणाम यह रहा कि 11 प्रतिशत परिवार अनौपचारिक रूप से सिलेंडर खरीदते हैं और सर्वेक्षण के समय की 803 रुपये की खुदरा कीमत के मुकाबले 1,040 रुपये चुकाते हैं।

फुटपाथ या खुले स्थानों में रहने वाले 70 प्रतिशत श्रमिक केवल ठोस ईंधन पर निर्भर हैं, जबकि किराये के मकान में रहने वालों में यह आंकड़ा 11 प्रतिशत है। सर्वेक्षण में शामिल प्रवासियों में जो अनौपचारिक रूप से एलपीजी खरीदते हैं, वे 71 रुपये प्रति किलोग्राम की कीमत चुकाते हैं। यह औपचारिक कनेक्शन से मिलने वाली 59 रुपये प्रति किलोग्राम की कीमत से 20 प्रतिशत से अधिक है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जागरूकता की कमी और अंतिम छोर तक डिलीवरी नेटवर्क की समस्या की भरपाई अनौपचारिक कनेक्शन कर रहे हैं, जो किराना दुकानों और दूसरे अनधिकृत विक्रेताओं से अधिक कीमत पर खरीदे जाते हैं।

प्रवासी श्रमिकों को सबसे अधिक समस्या का सामना करना पड़ता है। सर्वेक्षण में शामिल 79 प्रतिशत प्रवासी एलपीजी उपभोक्ताओं के पास कोई औपचारिक कनेक्शन नहीं मिला, जबकि शहरी अनौपचारिक बस्तियों में इनकी संख्या 11 प्रतिशत रही। इस योजना को प्रवासी परिवारों तक पहुंचाने के लिए 2021 में नीति में बदलाव किया गया था, लेकिन चार प्रतिशत से भी कम प्रवासी श्रमिक प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना में पंजीकृत पाये गये।

इन अध्ययनों में छह राज्यों के 2,200 से अधिक ग्रामीण परिवार, अनौपचारिक बस्तियों के 1,100 से अधिक परिवार और 10 शहरों के 1,000 से अधिक प्रवासी श्रमिक शामिल हैं।

सीईईडब्ल्यू के फेलो प्रार्थना बोरा ने कहा, “ये अध्ययन दिखाते हैं कि एलपीजी कनेक्शन देना सिर्फ पहला कदम है। अगर परिवार नियमित रीफिल का खर्च नहीं उठा पाते, प्रवासियों को उज्ज्वला योजना के तहत औपचारिक कनेक्शन की जानकारी नहीं है, या सिलेंडर ग्रामीण घरों तक विश्वसनीय ढंग से नहीं पहुंचते हैं, तो परिवारों के सामने प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन का जोखिम बना रहता है।”

तीनों सर्वेक्षणों में सामने पाया गया कि रीफिल की कीमत 400 रुपये प्रति सिलेंडर करने से गरीब परिवार एलपीजी का ज्यादा इस्तेमाल कर सकेंगे। रिपोर्ट में सरकार से उज्ज्वला योजना के तहत प्रति सिलेंडर सब्सिडी करीब 200 रुपये बढ़ाने की अपील की गयी है।

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