भोपाल। जैन धर्माचार्य परम पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने कहा है कि साधक के जीवन में अहंकार सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। उन्होंने श्रद्धालुओं से विनम्रता, करुणा और आत्मचिंतन को जीवन में अपनाने का आह्वान किया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने कहा कि अहंकार केवल धन या पद से ही उत्पन्न नहीं होता, बल्कि ज्ञान, तप, प्रतिष्ठा और स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानने की भावना से भी पैदा हो सकता है। व्यक्ति जैसे ही स्वयं को दूसरों से बड़ा समझने लगता है, उसके भीतर अभिमान जन्म लेने लगता है।
उन्होंने कहा कि अहंकार के साथ किया गया तप भी अपना वास्तविक उद्देश्य खो देता है। इसलिए साधक को हर परिस्थिति में विनम्रता और करुणा बनाए रखनी चाहिए।
सेवा और उदारता पर बल देते हुए आचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति के पास जो कुछ भी है, उसका लाभ दूसरों को भी मिलना चाहिए। यही करुणा और सच्चे धर्म का मार्ग है। दान देने वाले और ज्ञान प्रदान करने वाले व्यक्ति को भी अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे केवल माध्यम हैं।
उन्होंने धर्म के अनुयायियों और व्रतधारियों के प्रति प्रेम एवं सम्मान रखने की बात कहते हुए कहा कि उनकी सेवा की जानी चाहिए, उन पर अधिकार जताने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं से अपशब्दों और आलोचनाओं पर प्रतिक्रिया न देने तथा धर्माचार्यों की निंदा से बचने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि साधक को दूसरों की कमियां खोजने के बजाय स्वयं को शुद्ध करने पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि स्वाभिमान आवश्यक है, लेकिन अभिमान और अहंकार व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से भारी बना देते हैं, जबकि विनम्रता उसे मुक्ति के मार्ग की ओर अग्रसर करती है।
