रतलाम के शासकीय मंदिर की बेशकीमती भूमि पर अवैध कब्जे की कोशिश नाकाम

रतलाम। ग्राम कुंवरवाड़ा (तहसील रावटी) स्थित प्रसिद्ध शासकीय मंदिर श्री नागनेश्वरजी माताजी मंदिर की करोड़ों रुपये मूल्य की शासकीय भूमि पर वर्षों से जारी अतिक्रमण और मालिकाना हक के दावे को न्यायालय ने पूरी तरह खारिज कर दिया है। सप्तम जिला न्यायाधीश राजेश नामदेव की अदालत ने वादी की अपील को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया है कि उक्त भूमि पर केवल राज्य शासन का ही स्वत्व और स्वामित्व बरकरार रहेगा।

कलेक्टर हैं मंदिर के वैध प्रबंधक

प्रकरण में राज्य शासन का पक्ष रखने वाले शासकीय अधिवक्ता समरथ पाटीदार ने हरमुद्दा को बताया कि राजस्व अभिलेखों, खसरा तथा खतौनी के बारीकी से परीक्षण के बाद न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि विवादित भूमि मंदिर श्री नागनेश्वरी माताजी, कुंवरवाड़ा की ही है। सरकारी दस्तावेजों में इसके प्रबंधक के रूप में कलेक्टर रतलाम का नाम विधिवत दर्ज है। वादी कृष्ण कुमार (पिता मांगीलाल तेली, निवासी रावटी) अदालत में ऐसा कोई भी ठोस दस्तावेज पेश करने में पूरी तरह असफलता रहे, जिससे उनका मालिकाना हक सिद्ध हो सके।

60 साल के कब्जे का दावा खारिज, न्यायालय ने कहा- ‘सिर्फ लंबा कब्जा काफी नहीं’

वादी पक्ष ने अदालत में तर्क दिया था कि उनका उक्त भूमि पर 60 से अधिक वर्षों से शांतिपूर्ण और निरंतर कब्जा व खेती का काम चल रहा है, इसलिए ‘प्रतिकूल आधिपत्य’  के आधार पर उनका नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए और शासन की बेदखली कार्रवाई पर रोक लगाई जाए।

न्यायालय ने इस दावे को खारिज करते हुए बेहद कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि वादी यह सिद्ध करने में नाकाम रहे कि वे किस निश्चित तारीख से भूमि पर काबिज हुए।

कब्जे की वास्तविक प्रकृति क्या थी और यह वास्तविक स्वामी (शासन) के अधिकारों के खिलाफ कब से और कैसे रहा, इसका कोई स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।

न्यायालय ने दोटूक टिप्पणी की कि महज लंबे समय तक कब्जा रखना कानूनन ‘प्रतिकूल आधिपत्य’ से मालिकाना हक पाने का आधार नहीं बन सकता।

42 साल पुराना विवाद: बार-बार याचिका लगाकर अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग

मामले की पृष्ठभूमि बताते हुए शासकीय अधिवक्ता ने बताया कि इस भूमि को लेकर

कानूनी विवाद वर्ष 1984 से चला आ रहा था:

वर्ष 1984: पहला व्यवहार वाद प्रस्तुत हुआ, जिसे 1992 में निरस्त किया गया।

वर्ष 1992: प्रथम अपील निरस्त हुई।

वर्ष 2011: द्वितीय अपील का निराकरण हुआ।

वर्ष 2016: पुन: समान प्रकृति का नया मामला अदालत में लाया गया।

31 अक्टूबर 2025: अतिरिक्त व्यवहार न्यायाधीश सैलाना ने वादी का दावा निरस्त कर दिया था, जिसके खिलाफ जिला न्यायालय में यह अपील दायर की गई थी। न्यायालय ने पाया कि एक ही प्रकृति के दावे बार-बार लगाकर न्यायालयीन प्रक्रिया का दुरुपयोग किया जा रहा था।

प्रशासन को नियमानुसार कार्रवाई और बेदखली की खुली छूट

अदालत ने माना कि प्रशासन द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस और अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया पूरी तरह न्यायसंगत है। शासन द्वारा की जा रही कार्रवाई को ‘अवैध हस्तक्षेप’ नहीं माना जा सकता। सप्तम जिला न्यायालय ने अपने फैसले की प्रति कलेक्टर रतलाम और तहसीलदार रावटी को भेजते हुए शासकीय भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने और विधि अनुसार सख्त कार्रवाई करने के लिए प्रशासन को पूर्ण स्वतंत्रता दे दी है।

भूमि पर है अवैध कब्जा

रावटी क्षेत्र की जानकार का कहना है कि कुवर पाडा आदिवासी ग्राम में स्थित राजशाही परिवार की श्री नागनेश्वरी माता मंदिर की कृषि जमीन हैं। जिला कलेक्टर को चाहिए कि मंदिर की जो जमीन जिसके कब्जे में है, उस परिवार के पास वर्तमान में राजस्व की शासकीय भूमि भी अवैध रूप से हैं। उसमें मकान, शटर वाली दुकाने भी वर्तमान में स्टेशन रोड पर स्थित हैं, उन्हें भी देखना चाहिए।

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