रायपुर, 16 अगस्त (वार्ता) छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने रविवार को प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री के स्वतंत्रता दिवस संबोधन की आलोचना करते हुए कहा कि दोनों के भाषण ने देश और प्रदेश की जनता को निराश किया है। उन्होंने खनिज संशोधन कानून, खुले में पड़े धान और शिक्षकों की पेंशन गणना को लेकर भी राज्य एवं केंद्र सरकार पर निशाना साधा।
श्री बैज ने राजधानी रायपुर में संवाददाताओं से चर्चा में कहा कि प्रधानमंत्री ने लाल किले और मुख्यमंत्री ने रायपुर के पुलिस परेड ग्राउंड से 15 अगस्त को दिए अपने संबोधन में रोजगार, शिक्षा और विकास जैसे मुद्दों पर अपेक्षित बात नहीं की। उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों नेताओं ने पूर्ववर्ती सरकारों को कोसने पर अधिक जोर दिया।
उन्होंने प्रधानमंत्री के संबोधन का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि युवाओं के आंदोलनों को अप्रत्यक्ष रूप से नक्सली विचारधारा से जोड़ना देश की युवा पीढ़ी का अपमान है। उन्होंने कहा कि सरकार निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली और रोजगार उपलब्ध कराने में विफल रही है तथा विरोध करने वाले युवाओं पर इस तरह के आरोप उचित नहीं हैं। श्री बैज ने इस मामले में प्रधानमंत्री से देश के युवाओं से माफी मांगने की मांग की।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने संसद में पारित खनिज संबंधी संशोधन कानून को छत्तीसगढ़ के हितों के खिलाफ बताते हुए कहा कि राज्य में कोयला, बॉक्साइट और लौह अयस्क सहित अनेक खनिजों का उत्पादन होता है। उन्होंने दावा किया कि नए प्रावधानों से राज्यों के खनिजों पर उपकर लगाने के अधिकार प्रभावित होंगे। कांग्रेस इसका विरोध करेगी। श्री बैज ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने यह कानून उद्योगपति गौतम अडानी को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से बनाया है।
श्री बैज ने पिछले खरीफ सीजन में समर्थन मूल्य पर खरीदे गए धान के रखरखाव को लेकर भी राज्य सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि करीब 15 लाख टन धान अब भी संग्रहण केंद्रों में खुले में पड़ा है और बारिश में भीगने के कारण खराब हो रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि धान के समय पर निराकरण में लापरवाही की गई है और इसकी आड़ में भ्रष्टाचार की आशंका है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस प्रदेश के सभी जिलों में जांच समितियां भेजकर खुले में पड़े धान का भौतिक सत्यापन कराएगी। पार्टी किसानों और जनता की मेहनत की कमाई की बर्बादी के खिलाफ आवाज उठाएगी।
श्री बैज ने शिक्षकों की पेंशन गणना के मुद्दे पर कहा कि सरकार ने पेंशन के लिए वर्ष 2018 में हुए संविलियन के बाद की सेवा अवधि को आधार मानने का निर्णय लिया है। इससे 1998 से 2018 के बीच की सेवा अवधि गणना में शामिल नहीं होने से लंबे समय से कार्यरत शिक्षकों को नुकसान होगा।
उन्होंने मांग की कि शिक्षकों की पेंशन की गणना में उनकी प्रथम नियुक्ति से लेकर पूरी सेवा अवधि को शामिल किया जाए और संविलियन से पहले की सेवा को भी मान्यता दी जाए।
