कराते के मैदान का योद्धा हार गया जिंदगी की जंग

सीधी:सिंगरौली के कराते क्षितिज का पहला सितारा अस्त
अविभाजित सीधी के प्रथम राष्ट्रीय कराते खिलाड़ी अर्जुन दास गुप्ता का निधन
स्वर्ण पदक से राष्ट्रीय पहचान तक, संघर्ष और समर्पण की मिसाल थे अर्जुन
खेल के साथ समाजसेवा में भी बनाई अलग पहचान, निधन से शोक की लहर
सिंगरौली। जिस खिलाड़ी ने कभी कराते के मैदान में अपने दमखम से अविभाजित सीधी जिले का नाम रोशन किया था, वही योद्धा जिंदगी की जंग हार गया। कराते के प्रथम राज्यस्तरीय स्वर्ण पदक विजेता एवं प्रथम राष्ट्रीय खिलाड़ी अर्जुन दास गुप्ता का वाराणसी के हेरिटेज हॉस्पिटल में उपचार के दौरान निधन हो गया। उनके निधन की खबर से सीधी-सिंगरौली के खेल जगत के साथ सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई।
अर्जुन दास गुप्ता लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उपचार के दौरान स्वास्थ्य में सुधार के बाद अचानक तबीयत बिगड़ी, जिसके बाद परिजनों ने उन्हें वाराणसी के हेरिटेज हॉस्पिटल में भर्ती कराया। चिकित्सकों के अथक प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके निधन ने उन तमाम लोगों को स्तब्ध कर दिया, जो उन्हें खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि सहज, मिलनसार और संवेदनशील व्यक्तित्व के रूप में जानते थे।
अविभाजित सीधी जिले में कराते को पहचान दिलाने वाले शुरुआती खिलाड़ियों में अर्जुन गुप्ता का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। ऐसे समय में जब कराते के लिए संसाधन और सुविधाएं सीमित थीं, उन्होंने अपनी मेहनत, अनुशासन और प्रतिभा के दम पर राज्यस्तर पर स्वर्ण पदक हासिल किया और राष्ट्रीय स्तर पर जिले का प्रतिनिधित्व किया। उनकी उपलब्धियां आज भी नई पीढ़ी के खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा हैं।
कराते के मैदान से बाहर भी अर्जुन गुप्ता का व्यक्तित्व लोगों के दिलों में जगह बनाए हुए था। समाज के हर वर्ग से उनका आत्मीय जुड़ाव था। किसी की परेशानी में साथ खड़े होना और जनसमस्याओं के समाधान के लिए आवाज उठाना उनके स्वभाव में शामिल था। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती गौरी गुप्ता नगर पालिक निगम सिंगरौली के वार्ड क्रमांक 41 से निर्वाचित पार्षद हैं। पार्षद प्रतिनिधि के रूप में अर्जुन गुप्ता भी क्षेत्र की समस्याओं और सामाजिक सरोकारों से सक्रिय रूप से जुड़े रहे।
उनके निधन से कराते खिलाड़ी, प्रशिक्षक, खेलप्रेमी, सामाजिक कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि और आम नागरिक गमगीन हैं। अर्जुन गुप्ता का जाना एक व्यक्ति की विदाई भर नहीं, बल्कि उस दौर के एक ऐसे अध्याय का अंत है, जिसने सीमित संसाधनों में कराते को नई पहचान दी। उनका स्वर्ण पदक, राष्ट्रीय उपलब्धि और समाजसेवा की विरासत आने वाली पीढ़ियों को हमेशा संघर्ष, अनुशासन और समर्पण की प्रेरणा देती रहेगी।

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