भोपाल : 15 अगस्त 1947 को जब पूरा देश अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हुआ, तब भोपाल की कहानी कुछ अलग थी। भोपाल रियासत में उस समय सत्ता का हस्तांतरण नहीं हुआ और यहां के लोगों को अपनी आजादी के लिए करीब पौने दो साल का इंतजार करना पड़ा। आखिर उस दौर में भोपाल का माहौल कैसा था? नवाब हमीदुल्लाह खान का क्या रुख था और भोपाल की जनता ने आजादी के आंदोलन में किस तरह भूमिका निभाई?
इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए हमने वरिष्ठ इतिहासकार और भोपाल के इतिहास पर किताब लिख चुके श्री रमेश शर्मा से खास बातचीत की। उन्होंने बताया कि 15 अगस्त 1947 को अंग्रेज भारत से जरूर चले गए, लेकिन भोपाल के तत्कालीन नवाब स्वतंत्र रियासत बनाए रखने की कोशिश में थे।
इतिहासकार के मुताबिक, इसके बाद भोपाल समेत सीहोर, बरेली और उदयपुरा जैसे इलाकों में आंदोलन तेज हुआ। सभाएं हुईं, लोगों ने विरोध जताया और बड़ी संख्या में जनता भारत में विलय के पक्ष में सामने आई। आंदोलन के दौरान कई लोगों ने बलिदान भी दिया, जिसके बाद भोपाल के भारत में विलय का रास्ता साफ हुआ।
1 जून 1949 को भोपाल भारतीय संघ का हिस्सा बना और यहां के लोगों को वह आजादी मिली, जिसका वे लंबे समय से इंतजार कर रहे थे। इस खास इंटरव्यू में जानिए भोपाल की देर से मिली आजादी की पूरी कहानी, उस दौर का माहौल और आम जनता के संघर्ष की अनसुनी बातें।
