
आलीराजपुर। शहर के बस स्टैंड स्थित वर्तमान शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय अपने भीतर आलीराजपुर रियासत के इतिहास की एक महत्वपूर्ण विरासत समेटे हुए है। बताया जाता है कि तत्कालीन आलीराजपुर महाराजा प्रताप सिंह प्रथम अथवा द्वितीय के शासनकाल में करीब वर्ष 1910 के आसपास अपनी पुत्री सुश्रीमंत राजकुंवर की शिक्षा के उद्देश्य से इस विद्यालय परिसर का निर्माण कराया गया था। बाद में यह परिसर शिक्षा विभाग को दान कर दिया गया।
करीब 116 वर्ष पुरानी इस ऐतिहासिक धरोहर के बावजूद विद्यालय को आज भी उस व्यक्तित्व के नाम से पहचान नहीं मिल सकी, जिसके नाम और स्मृति से इसका निर्माण जुड़ा बताया जाता है। विद्यालय परिसर की दीवार पर आज भी लगा बैनर इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की ओर संकेत करता है।
दान की धरोहर, लेकिन नाम की पहचान नहीं
इतिहास से जुड़े इस महत्वपूर्ण स्थल को लेकर शहर के कुछ समाजसेवियों ने अब पहल की है। उनका कहना है कि जिस परिसर को तत्कालीन राजपरिवार ने बालिका शिक्षा के उद्देश्य से बनवाकर शासन को सौंपा, उसकी स्मृति को संरक्षित करना शासन और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।
इसी उद्देश्य से विद्यालय का नाम “सुश्रीमंत राजकुंवर शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय” किए जाने की मांग को लेकर करीब छह माह पूर्व दिनेशचंद विश्वकरमा ने जनसुनवाई में आवेदन प्रस्तुत किया गया था। आवेदन के माध्यम से शिक्षा विभाग से नामकरण में आवश्यक संशोधन कर विद्यालय को उसकी ऐतिहासिक पहचान दिलाने का आग्रह किया गया।
छह माह बाद भी कार्रवाई का इंतजार
समाजसेवियों का आरोप है कि आवेदन दिए जाने के बावजूद अब तक नामकरण की प्रक्रिया में कोई ठोस प्रगति दिखाई नहीं दे रही है। उनका कहना है कि जब शासन स्तर पर विभिन्न अभियानों और योजनाओं का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाता है, तब शहर की करीब 116 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक शैक्षणिक धरोहर को उसके वास्तविक नाम से पहचान दिलाने की प्रक्रिया इतनी लंबी क्यों खिंच रही है?
उनका कहना है कि यह केवल नाम बदलने का मामला नहीं है, बल्कि आलीराजपुर के इतिहास, बालिका शिक्षा की पुरानी परंपरा और राजपरिवार द्वारा शिक्षा के लिए किए गए योगदान को सम्मान देने का विषय है।
इतिहास को संरक्षित करने की जरूरत
आलीराजपुर की राजशाही विरासत से जुड़े अनेक भवन और स्थल आज भी शहर के इतिहास के साक्षी हैं। ऐसे में पुरानी शैक्षणिक संस्थाओं के इतिहास और उनके निर्माण से जुड़ी स्मृतियों को सरकारी दस्तावेजों और संस्थागत पहचान में संरक्षित किया जाना आवश्यक है।
समाजसेवियों ने जिला प्रशासन एवं शिक्षा विभाग से मांग की है कि जनसुनवाई में दिए गए आवेदन की स्थिति स्पष्ट करते हुए नामकरण संशोधन की प्रक्रिया को शीघ्र पूर्ण किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां यह जान सकें कि आज जिस विद्यालय में बालिकाएं शिक्षा प्राप्त कर रही हैं, उसकी नींव करीब 116 वर्ष पहले किस उद्देश्य से रखी गई थी और उसके पीछे किसकी प्रेरणा एवं योगदान था।
