
इंदौर. पति के निधन की खबर से परिवार सदमे में था, लेकिन इसी बीच पत्नी ने ऐसा फैसला लिया जिसने वहां मौजूद लोगों को भी भावुक कर दिया. पति के अंगदान की सहमति देने से पहले पत्नी ने खुद अंगदान और देहदान का संकल्प लिया. इसके बाद पति के अंगदान की अनुमति दी. परिवार के इस फैसले से दो मरीजों को किडनी मिली, जबकि नेत्रदान भी किया. अंगों को समय पर अस्पतालों तक पहुंचाने के लिए इंदौर का 69वां ग्रीन कॉरिडोर बनाया.
शुजालपुर में रहने वाले 54 वर्षीय कैलाश नारायण पाठक मंडी सचिव, बड़ोद के पद पर कार्यरत थे. उनकी संभावित ब्रेन डेथ के बाद डॉक्टरों ने परिजन से अंगदान को लेकर चर्चा की. पत्नी मनोरमा ने पहले अपना संकल्प पत्र भरा. इसके बाद उन्होंने पति के अंगदान की सहमति दी. बेटियां प्रतिमा और पूजा तथा बेटे शुभम ने भी परिवार के इस फैसले में साथ दिया. परिवार ने सभी संभावित अंगों के दान की सहमति दी थी, लेकिन तकनीकी कारणों से केवल दो किडनी और नेत्रदान ही संभव हो सका. दोनों किडनी अलग अलग मरीजों के प्रत्यारोपण के लिए भेजी गईं. एक किडनी चोइथराम अस्पताल और दूसरी एमिनेंट अस्पताल के मरीज को दी गई. नेत्रदान शंकरा आई अस्पताल के माध्यम से कराया. अंगदान की प्रक्रिया के दौरान अस्पताल से संबंधित मरीजों तक अंग पहुंचाने के लिए दो ग्रीन कॉरिडोर बनाए. पूरी प्रक्रिया में करीब 60 घंटे तक चिकित्सकों, अंगदान समन्वयकों और सेवादारों की टीम सक्रिय रही. परिवार से बातचीत और जरूरी व्यवस्थाओं के बीच एक-एक प्रक्रिया पूरी की गई. अंगदान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद कैलाश पाठक के पार्थिव शरीर को गार्ड ऑफ ऑनर दिया. सुबह करीब 7.30 बजे पार्थिव शरीर शुजालपुर स्थित उनके घर के लिए रवाना किया. इस पूरी प्रक्रिया में सांसद शंकर लालवानी ने भी परिवार से संपर्क बनाए रखा. संभागायुक्त भास्कर लाक्षाकार, सीएमएचओ डॉ. माधव प्रसाद हासानी, एमजीएम मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. अरविंद घंघेरिया और अंगदान से जुड़े अधिकारियों ने आवश्यक समन्वय किया. पुलिस प्रशासन और चिकित्सकीय टीमों ने भी ग्रीन कॉरिडोर के दौरान व्यवस्थाएं संभालीं.
दो मरीजों को मिली नई जिंदगी…
परिवार जिस परिस्थिति से गुजर रहा था, उसमें भी उन्होंने अंगदान का फैसला लिया. पत्नी ने पहले स्वयं अंगदान देहदान का संकल्प लेकर पति के अंगदान की सहमति दी, यह निर्णय बेहद भावुक करने वाला था. दो मरीजों को किडनी मिलने से उन्हें नई जिंदगी की उम्मीद मिली है.
जीतू बगानी, मुस्कान ग्रुप पारमार्थिक ट्रस्ट
