जबलपुर: आपराधिक मामले में आरोपी को मिली जमानत निरस्त किये जाने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गयी थी। हाईकोर्ट जस्टिस आर के चौबे की एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है जमानत देने व पूर्व में मिली जमानत को निरस्त करने के नियम अलग-अलग है। पूर्व में मिली जमानत को ठोस व खास परिस्थितियों में निरस्त की जाती है।
नर्मदापुरम निवासी सचिन ठाकुर की तरफ से दायर की गयी याचिका में कहा गया था कि आपराधिक प्रकरण में अनावेदक राकेश रघुवंशी को जिला न्यायालय से जमानत का लाभ इस आधार पर मिल गया था कि सह आरोपी को हाईकोर्ट से जमानत मिल गयी थी।
न्यायालय के द्वारा निर्धारित जमानत शर्तों के अनुसार आरोपी कोई अन्य अपराध नहीं करेंगे। जमानत पर रिहा होने के बावजूद भी अनावेदक के द्वारा अपराध किये गये,जो जमानत शर्तों का उल्लंघन है। याचिका में राहत चाही गयी थी कि अनावेदक को मिली जमानत को निरस्त किया जाये।
याचिका की सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता ने पूर्व में जिला न्यायालय के समक्ष आवेदक की जमानत निरस्त करने की मांग करते हुए आवेदन दायर किया था। जिला न्यायालय ने याचिकाकर्ता का आवेदन इस आदेश के साथ खारिज कर दिया था कि ठोस व खास परिस्थितियों में न्यायालय से मिली जमानत को निरस्त किया जाता है। एकलपीठ ने जिला न्यायालय के आदेश को उचित करार देते हुए याचिका को खारिज कर दिया।
