मुंबई, 31 जुलाई (वार्ता) बंबई उच्च न्यायालय ने राज्य सचिवालय की कैंटीन की सफाई को लेकर खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) को कड़ी फटकार लगायी है। न्यायालय ने कहा कि एफडीए ने कैंटीन को लगभग पूरी तरह साफ और कीड़े-मकोड़ों से मुक्त बताया था, लेकिन न्यायालय के आदेश पर हुए स्वतंत्र निरीक्षण में यह दावा गलत साबित हुआ।
एफडीए और उसके आयुक्त तुकाराम मुंढे पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए न्यायालय ने कहा कि सरकारी कैंटीनों पर भी निजी होटलों की तरह सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो निजी होटलों पर छोटी-छोटी कमियों के लिए की जा रही सख्त कार्रवाई भी बंद की जानी चाहिए।
इससे पहले एफडीए ने न्यायालय में हलफनामा देकर दावा किया था कि मंत्रालय कैंटीन 98 प्रतिशत साफ है और वहां कीड़े-मकोड़े नहीं हैं। जब वकीलों और एफडीए अधिकारियों की टीम ने वहां जाकर अचानक जांच की, तो दावों की पोल खुल गयी। जांच में कैंटीन में मक्खियां भिनभिनाती मिलीं, सब्जियां काटने वाले चाकुओं पर जंग लगा था, फर्श की टाइलें टूटी थीं, नल से पानी रिस रहा था और जहां बर्तन धोए जा रहे थे, ठीक वहीं ड्रेनेज पाइपलाइन टूटी पड़ी थी।
सचिवालय की कैंटीन में गंदे फ्रिज की तस्वीरें देखकर न्यायमूर्ति रवींद्र घुगे नाराज हो गये। उन्होंने अधिकारियों को फटकार लगाते हुए कहा, “इस फ्रिज से तो जूतों की अलमारी भी ज्यादा साफ होती है।”
सरकारी कैंटीन और निजी होटलों के साथ अलग-अलग व्यवहार पर नाराजगी जताते हुए न्यायालय ने एफडीए के सामने दो विकल्प रखे। पहला, मंत्रालय की कैंटीन का लाइसेंस तुरंत रद्द किया जाये। दूसरा, यदि सरकारी कैंटीन पर कार्रवाई नहीं होती, तो निजी होटलों के खिलाफ छोटी-छोटी कमियों के आधार पर की गयी सख्त कार्रवाई और लाइसेंस रद्द करने के फैसले वापस लिये जायें।
कानून के सामने सभी को बराबर बताते हुए न्यायालय ने कहा कि वीआईपी या सरकारी तंत्र के लिए नियम नहीं बदले जा सकते। न्यायालय ने एफडीए आयुक्त तुकाराम मुंढे के स्वच्छता अभियान की तारीफ तो की, लेकिन साथ ही यह सलाह भी दी कि बिना नोटिस दिए सीधे लाइसेंस रद्द करने के बजाय दुकानदारों को सुधार का एक मौका जरूर दिया जाना चाहिए।
