नयी दिल्ली, 29 जुलाई (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने बच्चों की एनिमेशन फिल्म ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ की रिलीज का मार्ग प्रशस्त करते हुए बुधवार को कहा कि वह कला और रचनात्मकता का मूल्यांकन करने के लिए नहीं बैठ सकता।
इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने फिल्म निर्माता कंपनी ‘एएलई एनिमेशन प्राइवेट लिमिटेड’ को 12 दिवसीय भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा और उससे जुड़ी परंपराओं के समापन के एक दिन बाद यानी 28 जुलाई 2026 या उसके बाद देश भर में फिल्म रिलीज करने की अनुमति देने वाले अपने 17 जुलाई के आदेश में संशोधन करने से इनकार कर दिया।
वार्षिक भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई को शुरू हुई थी और 27 जुलाई 2026 को संपन्न हुई।
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने ओडिशा सरकार और भगवान जगन्नाथ मंदिर के मुख्य प्रशासक के 17 जुलाई के आदेश में संशोधन की मांग वाली याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि “ऐसी आपत्तियों पर विचार करने से न्यायालय को हिंदू देवी-देवताओं से जुड़ी सभी कलाओं और साहित्य पर प्रतिबंध लगाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।”
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि दो या तीन लोगों के कहने पर ऐसी संवेदनशीलताओं को तवज्जो देने से न्यायालय को हिंदू देवी-देवताओं से संबंधित सभी कलाओं और साहित्यों पर रोक लगाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। उन्होंने टिप्पणी की कि यदि ऐसा नजरिया अपनाया गया तो कोई रचनात्मकता या साहित्य बचेगा ही नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि रामायण और महाभारत जैसी कथाओं को हर जगह अपनी तरह से सुनाने का चलन है और यह फिल्म बच्चों के लिए बनायी गयी है।
इससे पहले मंगलवार को सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सवाल उठाया था कि क्या भगवान जगन्नाथ के एनिमेटेड चित्रण से श्रद्धालुओं की आस्था कम हो जायेगी।
आज की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति महादेवन ने वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत से पूछा कि एनिमेशन फिल्म के निर्माता राज्य सरकार और मंदिर प्रशासन के सुझाये बदलावों को स्वीकार करने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं?
श्री कामत ने तर्क दिया कि निर्माता भगवान का अपमानजनक चित्रण करने वाले अंतिम व्यक्ति होंगे और उन्होंने कहा कि यह फिल्म एक बच्चे की प्रार्थना पर आधारित है। उन्होंने किसी भी तरह के समझौते से इनकार करते हुए ध्यान दिलाया कि मंदिर समिति के सदस्य फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग बीच में ही छोड़कर बाहर चले गये थे।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने निर्माताओं से कहा कि यदि उन्हें खुद लगता है कि किसी हिस्से में संपादन की जरूरत है तो वे ऐसे बदलाव करने के लिए स्वतंत्र हैं। उन्होंने दोहराया कि न्यायालय कला का फैसला करने के लिए नहीं बैठ सकती।
मंदिर प्रशासन की ओर से पेश ओडिशा के महाधिवक्ता पीतांबर आचार्य ने तर्क दिया कि फिल्म की रिलीज का आदेश एक अदालती प्रमाण पत्र पर आधारित था, जिसकी समीक्षा की जा सकती है। उन्होंने न्यायालय को बताया कि मंदिर समिति ने भगवान जगन्नाथ के काल्पनिक चित्रण पर आपत्ति जताते हुए केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) से अलग से संपर्क किया है। न्यायालय को यह भी बताया गया कि ओडिशा सरकार ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को पत्र लिखा है।
श्री आचार्य ने कहा कि फिल्म निर्माता ने फिल्म को पूरी तरह से काल्पनिक बताते हुए केवल एक हिस्से को हटाने पर सहमति जतायी थी। याचिकाएं खारिज होने के बाद उन्होंने कहा कि ओडिशा सरकार या केंद्र सरकार अब भी इस मामले पर स्वतंत्र फैसला ले सकती हैं।
