नयी दिल्ली, 28 जुलाई (वार्ता) उद्योग मंडल फिक्की और परामर्श सेवाएं देने वाली फर्म ईवाई की देश के शहरों की आर्थिक संभावनाओं पर केंद्रित रिपोर्ट ‘सिटीज़ ऐज़ ग्रोथ इंजिन्स: पावरिंग इंडियाज नेक्स्ट लीप’ के अनुसार अर्थव्यस्था में महती योगदान कर रहे इन शहरों को जलवायु-अनुकूल एवं निम्न-कार्बन (लो-कार्बन) बनाने के लिए वर्ष 2050 तक अनुमानित 2.4 लाख करोड़ डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी जो फिलहाल नगर निकायों की क्षमता से बाहर लगती है।
रिपोर्ट के अनुसार अब तक केवल 20 नगर निगम ही पूंजी बाजार तक पहुँची हैं और उन्होंने सामूहिक रूप से लगभग 47.6 करोड़ डॉलर की पूंजी जुटाई है। रिपोर्ट के अनुसार शहरी क्षेत्र में देश की कुल एक तिहाई आबादी है और राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 60 प्रतिशत से अधिक योगदान दे रहे हैं। इसके विपरीप नगर निकायों की आय जीडीपी के लगभग 0.6 प्रतिशत के बराबर ही है।
फिक्की-ईवाई रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले 15 वर्षों में भारत को शहरी बुनियादी ढांचे के विकास के लिए लगभग 840 अरब डॉलर अर्थात प्रतिवर्ष करीब 55 अरब डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी। साथ ही, वर्ष 2047 तक जिन शहरी अवसंरचनाओं की आवश्यकता होगी, उनमें से लगभग 70 प्रतिशत का निर्माण अभी होना बाकी है।
अनुमान है कि वर्ष 2036 तक भारत की शहरी आबादी लगभग 60 करोड़ हो जाएगी, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 70 प्रतिशत का योगदान देगी। वर्ष 2050 तक यह आबादी बढ़कर 87.7 करोड़ तक पहुँचने तथा जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी 75 प्रतिशत होने का अनुमान है।
फिक्की की शहरी विकास एवं रियल एस्टेट समिति के अध्यक्ष तथा आरएमज़ेड के पर्यवेक्षी बोर्ड के अध्यक्ष राज मेंडा ने कहा, ” हमारे शहरों की पूरी क्षमता को सामने लाने और विकसित भारत 2047 की दिशा में भारत की यात्रा को गति देने के लिए मजबूत प्रशासन, नवोन्मेषी वित्तपोषण तथा एकीकृत योजना अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे।”
रिपोर्ट में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा घोषित 1,00,000 करोड़ रुपये के शहरी चुनौती कोष को केवल एक योजना नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संकेत बताया गया है। इस फंड के तहत शहरी स्थानीय निकायों को प्रत्येक परियोजना की लागत का 50 प्रतिशत पूंजी बाजार से जुटाना होगा, जिससे लगभग चार लाख करोड़ रुपये के निवेश को गति मिलने की उम्मीद है। रिपोर्ट के अनुसार, यह सरकार का स्पष्ट संदेश है कि भारतीय शहरों को इस प्रकार विकसित किया जाए कि वे निवेश आकर्षित करने में सक्षम बन सकें।
वर्तमान में देश के शीर्ष 10 शहर राष्ट्रीय जीडीपी का लगभग 30 प्रतिशत योगदान देते हैं, जबकि 36 मध्यम एवं बड़े शहर तथा लगभग 450 छोटे शहरी केंद्र, जहाँ शहरी आबादी का बड़ा हिस्सा निवास करता है, अभी भी अपनी पूरी आर्थिक क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं।
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि आर्थिक गलियारों (इकोनॉमिक कॉरिडोर) और पीएम गति शक्ति से जुड़े बहु-केंद्रित शहरी नेटवर्क का विकास किया जाए तथा टियर-2 और टियर-3 शहरों को क्षेत्रीय विकास केंद्रों के रूप में विकसित किया जाए। इसके लिए शहरों को केवल प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि सुशासन, भूमि प्रबंधन, शहरी नियोजन, वित्तपोषण, संस्थागत क्षमता और आर्थिक दृष्टि पर आधारित एकीकृत आर्थिक मंच के रूप में पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है।
रिपोर्ट का आधार पिछले एक दशक में शहरी विकास के क्षेत्र में हुई उल्लेखनीय प्रगति है। इसके अंतर्गत स्मार्ट सिटीज मिशन के तहत 1.64 लाख करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली 8,000 से अधिक परियोजनाएँ, अमृत मिशन के माध्यम से लगभग 500 शहरों में 2.7 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाएँ तथा प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत 1.25 करोड़ आवासों को स्वीकृति दी जा चुकी है।
