नयी दिल्ली, 20 जुलाई (वार्ता) भारत ने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के मत्स्य व्यापार सब्सिडी समझौते (एएफएस) पर अपना स्वीकृति का पत्र जमा कर दिया है और इसके साथ ही देश इस समझौते का विधिवत सदस्य बन गया है।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने सोमवार को एक विज्ञप्ति में बताया कि भारत की ओर से केंद्रीय वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने आज यह स्वीकृति-पत्र औपचारिक रूप से डब्ल्यूटीओ की महानिदेशक को सौंपा। यह समझौता जून 2022 में जिनेवा में आयोजित 12वें डब्ल्यूटीओ मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में सर्वसम्मति से अपनाया गया था और इसे इस बहुपक्षीय मंच पर पर्यावरणीय स्थिरता पर केंद्रित बहुपक्षीय समझौता बताया गया है।
भारत इस समझौते के लिए स्वीकृति-पत्र देने वाला डब्ल्यूटीओ का 123वां सदस्य देश है। इस समझौते में अवैध मत्स्य पकड़ने और समुद्री मत्स्य संसाधनों के अत्यधिक दोहन करने के काम को सरकारी सहायता देने पर रोक लगाने का प्रावधान है। इसका मकसद समुद्री जैव विविधता और समुद्री जीवन के संरक्षण को बढ़ावा देना है। दो-तिहाई सदस्य देशों द्वारा स्वीकृति मिलने के बाद यह समझौता 15 सितंबर, 2025 से प्रभावी हो गया है।
मंत्रालय ने कहा है कि भारत ने स्वस्थ मत्स्य व्यवसाय के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए इस समझौते के माध्यम से समुद्री संसाधनों को खाद्य सुरक्षा, आजीविका और तटीय समुदायों के रोजगार के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में संरक्षित रखने के संकल्प को भी दर्शाया है।
इस समझौते में पारंपरिक और छोटे स्तर के मछुआरों की आजीविका के अधिकारों की रक्षा करते हुए समुद्री झींगों के स्वस्थ व्यापार को प्रोत्साहित करने के प्रावधान हैं। इसके तहत अवैध और अनियमित मत्स्य पालन तथा अत्यधिक दोहन वाले मत्स्य भंडारों के दोहन से जुड़ी सब्सिडी पर रोक लगाई गई है।
यह समझौता उन बड़े औद्योगिक मत्स्य बेड़ों को मिलने वाली हानिकारक सब्सिडी पर नियंत्रण लगाकर वैश्विक मत्स्य व्यवस्था को अधिक संतुलित और न्यायसंगत बनाता है, जिन्हें दूरस्थ समुद्री क्षेत्रों में मत्स्य पकड़ने वाले देश संचालित करते हैं। इससे भारत जैसे देशों को लाभ मिलेगा, जहां मत्स्य पालन मुख्यतः छोटे स्तर पर किया जाता है।
वाणिज्य मंत्रालय ने कहा है कि इस समझौते का पक्षकार बनकर भारत ने एक बार फिर डब्ल्यूटीओ को केंद्र में रखते हुए नियम-आधारित वैश्विक व्यापार प्रणाली के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता को मजबूत किया है।
