झूठे पॉक्सो केस में फंसे एडवोकेट बाइज्जत बरी

ग्वालियर। कानून का दुरुपयोग करके किसी निर्दोष की सामाजिक प्रतिष्ठा और जिंदगी को किस तरह तबाह किया जा सकता है, इसका रोंगटे खड़े कर देने वाला सनसनीखेज मामला ग्वालियर की विशेष पॉक्सो कोर्ट में सामने आया है। विशेष न्यायाधीश पोक्सो कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पेशे से अधिवक्ता संकेत साहू (35 वर्ष) और के.के.पी. (57 वर्ष) को उनके खिलाफ दर्ज किए गए झूठे, मनगढ़ंत और फर्जी पॉक्सो मामले से पूर्णतः दोषमुक्त कर दिया है। न्यायालय ने विवेचना अधिकारी उपनिरीक्षक बलराम मांझी द्वारा की गई एकतरफा जांच पर अत्यंत गंभीर और सख्त टिप्पणियां की हैं, जिसने पुलिस प्रणाली के काले चेहरे को उजागर कर दिया है।

दोनों अभियुक्तगण एडवोकेट और पत्रकार की तरफ से पैरवी करने वाले एडवोकेट युवराज सिंह भदौरिया ने बताया कि आरोपी के.के.पी. के विरुद्ध पूर्व में भी प्रकरण क्र.एससी/110/2023 में भी सामान प्रकृति का आरोप लगाया था और उक्त प्रकरण में बताई गई कहानी को ही फिर से नई तारीख के साथ दूसरा झूठा मुकदमा पंजीबद्ध कराया था पूर्व में भी महिला थाना पड़ाव के प्रकरण में के.के.पी. को संदेह के परे दिनांक 11.03.2025 को दोषमुक्त किया गया था और वर्तमान दूसरा प्रकरण एससी/183/2023 में एडवोकेट और पत्रकार को असत्य आधारों पर दर्ज प्रकरण में दिनांक 14.07.2026 को दोषमुक्त किया गया हैं जिससे स्पष्ट होता हैं कि भारतीय न्याय व्यवस्था में देर हैं अंधेर नहीं और इस निर्णय से समाज में उन व्यक्तियों को आशा प्राप्त जागेगी कि न्यायालय में सत्य की होती हैं l

इस मुकदमे का दर्द बयां करते हुए पीड़ित अधिवक्ता संकेत साहू ने बताया कि जिस दिन पुलिस ने उन्हें इस झूठे केस में गिरफ्तार किया, उस दिन उनका बेटा मात्र 29 दिन का था। एक नवजात बच्चे और प्रसूता पत्नी को बेसहारा छोड़कर उन्हें 22 दिनों तक कालकोठरी में रहना पड़ा। वहीं उनके मित्र और पत्रकार के.के.पी. को पूरे 52 दिनों तक जेल की सलाखों के पीछे मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। उन्होंने कहा कि आरोपी के.के.पी. और पीड़िता के पिता आपस में सगे भाई हैं और उनके बीच पैतृक संपत्ति, मकान के हिस्सों तथा रुपयों के लेनदेन को लेकर पुराना विवाद चल रहा था। इसके अलावा के.के.पी. का अपनी पूर्व पत्नी से कस्टडी को लेकर भी विवाद चल रहा था। इसी रंजिश का बदला लेने के लिए पीड़िता के पिता और विरोधियों ने मिलकर 13 वर्षीय नाबालिग बेटी को मोहरा बनाया और पॉक्सो एक्ट का यह जाल बुना।

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