नयी दिल्ली, 10 जुलाई (वार्ता) प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर प्रो योगेश सिंह की पुनर्नियुक्ति के सरकार के निर्णय को दूरदर्शी और ऐतिहासिक महत्व का फैसला बताते विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर हिंदू स्टडीज़ में संयुक्त निदेशक डॉ. प्रेरणा मल्होत्रा ने कहा है कि श्री सिंह के लिए संस्थान को 21वीं सदी के एक अग्रणी शिक्षा केंद्र के रूप में ढालने का एक महती अवसर मिला है। डॉ मल्होत्रा ने कहा कि सरकार ने प्रो सिंह को जिस तरह उनका पहला कार्यकाल पूरा होने के तीन माह पूर्व ही पुनर्नियुक्ति की सूचना दे दी है उससे वे निरंतर महत्वूपूर्ण निर्णय करने की स्थिति में हैं। उल्लेखनीय है कि प्रो सिंह का वर्तमान कार्यकाल सात अक्टूबर को पूरा हो रहा है। पांच वर्ष के दूसरे कार्यकाल में वह 2031 तक इस विश्वविद्यालय का नेतृत्व करेंगे।
राष्ट्रपति दौपदी मुर्मु ने दिल्ली विश्वविद्यालय की विजिटर के रूप में अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए, प्रो.सिंह को दूसरा कार्यकाल प्रदान किया है। यह पुनर्नियुक्ति वर्ष 2023 में विश्वविद्यालय के अधिनियम की धारा 11-एफ (4) में संशोधन के अनुसार हुई है, जिसके तहत संस्थान में कार्यरत कुलपति की पुनर्नियुक्ति की जा सकती है। इस तरह यह इस संस्थान के संशोधित अधिनियम का पहला व्यावहारिक क्रियान्वयन है। इससे पहले किसी कार्यरत कुलपति को सीधे दूसरा कार्यकाल नहीं मिल सकता था। प्रो. सिंह ने आठ अक्टूबर 2021 को दिल्ली विश्वविद्यालय के 23वें कुलपति के रूप में कार्यभार ग्रहण किया था।
डॉ प्रेरणा मल्होत्रा ने कहा, ‘ प्रो. योगेश सिंह के पास अब वर्ष 2031 तक का पर्याप्त समय है, जिसमें वे दूरगामी और प्रभावशाली योजनाओं को साकार कर सकते हैं। एक दूरदर्शी, साहसी और अनुभवी शैक्षणिक प्रशासक के रूप में उनकी पहचान उन्हें इस दिशा में विशेष बढ़त प्रदान करती है। यदि उनका पहला कार्यकाल मुख्यतः नियुक्तियों, पदोन्नतियों और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन के लिए जाना जाएगा, तो दूसरा कार्यकाल विश्वविद्यालय में अनुसंधान की सशक्त संस्कृति विकसित करने, विकेंद्रीकृत प्रशासन को बढ़ावा देने तथा शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय व्यवस्थाओं को अधिक सुदृढ़ बनाने पर केंद्रित होना चाहिए।”
उन्होंने कहा, ” सरकार, शिक्षण समुदाय तथा देश का युवा वर्ग दिल्ली विश्वविद्यालय से बड़ी अपेक्षाएँ रखता है। सरकार ने अपने निर्णय की घोषणा समय रहते कर दी, जिससे कुलपति पर लागू होने वाला अंतिम तीन महीनों का वह प्रतिबंध प्रभावी नहीं हुआ, जिसके दौरान केवल नियमित एवं गैर-नीतिगत कार्य ही किए जा सकते हैं। अब यह दायित्व प्रो. योगेश सिंह के कंधों पर है कि वह अक्टूबर 2031 तक विश्वविद्यालय का नेतृत्व व्यापक दृष्टि, नई ऊर्जा और अधिक समर्पण के साथ करें।” उन्होंने कहा , ‘ यह अवसर प्रो. योगेश सिंह के लिए नि:संदेह व्यक्तिगत रूप से भी ऐतिहासिक अवसर है जिसमें वह इस गौरवशाली विश्वविद्यालय को नई ऊँचाइयों पर ले जा सकते हैं और संस्थागत रूप से दिल्ली विश्वविद्यालय को विकसित भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप एक अग्रणी विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित कर सकते हैं।”
दिल्ली विश्वविद्यालय आने से पहले प्रो. सिंह ने नेताजी सुभाष प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (दिल्ली), महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय (वडोदरा) तथा दिल्ली प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (दिल्ली) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में निदेशक एवं कुलपति के रूप में सफल नेतृत्व प्रदान किया है। डॉ प्रेरणा मल्होत्रा के अनुसार प्रो सिंह इस विश्वविद्यालय में ऐसे समय आये जब इसके शताब्दी वर्ष समारोह शुरू हुए थे। यह किसी भी नए कुलपति के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता था। ऐसे समय में प्रो. सिंह ने इसे एक बड़े अवसर में परिवर्तित करते हुए अनेक शैक्षणिक, सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रमों का सफल आयोजन कराया, महत्वपूर्ण प्रकाशनों का प्रकाशन सुनिश्चित किया तथा सबसे बढ़कर पूरे विश्वविद्यालय को एक टीम के रूप में कार्य करने के लिए प्रेरित किया।
उस समय विश्वविद्यालय का बड़ा हिस्सा अस्थायी (तदर्थ एवं अतिथि) शिक्षकों पर निर्भर था।प्रो. योगेश सिंह ने इस समस्या के समाधान के लिए एक सुविचारित कार्ययोजना तैयार की। मात्र दो से तीन वर्षों के भीतर 5,000 से अधिक शिक्षकीय पदों पर नियमित नियुक्तियाँ व्यवस्थित रूप से संपन्न कराई गयी। यह उपलब्धि देश- विदेश कहीं के किसी भी विश्वविद्यालय के लिए उल्लेखनीय मानी जा सकती है। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 का दिल्ली विश्वविद्यालय में सफल एवं सुचारु क्रियान्वयन किया जो उनकी एक बड़ी उपलब्धि है। इस दिशा में दिल्ली विश्वविद्यालय ने अन्य विश्वविद्यालयों के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत किया। वर्ष 2022 में स्नातक पाठ्यक्रम रूपरेखा (यूजीसीएफ-2022) लागू की गई, जिसके बाद स्नातकोत्तर स्तर पर भी पीजीसीएफ के माध्यम से राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप व्यापक पाठ्यक्रम सुधार किये गये।आधारभूत संरचना के क्षेत्र में भी विश्वविद्यालय ने अनेक महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं की योजना बनायी और उन्हें क्रियान्वित करना प्रारंभ किया।
उनके कार्यकाल में वीर सावरकर के नाम पर एक नया महाविद्यालय जुड़ा तथा एक अन्य महाविद्यालय का नामकरण सुषमा स्वराज के नाम पर किया गया। इस समय विश्वविद्यालय में अवसंरचना विस्तार की कई परियोजनाएँ कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं। डॉ प्रेरणा मल्होत्रा का कहना है कि कुलपति का दूसरा कार्यकाल इन परियोजनाओं को पूरा करने और आवश्यकता पड़ने पर उनका पुनर्मूल्यांकन करने का पर्याप्त अवसर प्रदान करेगा। संभवतः यही वे कारण हैं जिनके आधार पर केंद्र सरकार ने दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे विशाल संस्थान में प्रशासनिक निरंतरता बनाये रखने का निर्णय लिया है।

