सीहोर। मध्यप्रदेश सरकार द्वारा प्रदेश की नदियों, कुओं और बावडिय़ों के संरक्षण एवं पुनर्जीवन के उद्देश्य से शुरू किया गया ‘जल गंगा संवर्धन अभियानÓ जिला मुख्यालय सीहोर में दम तोड़ता नजर आ रहा है. स्थिति यह है कि अभियान की प्रदेश स्तरीय रैंकिंग में सीहोर जिला सबसे निचले पायदान पर पहुंच गया है. सरकारी अमले की उदासीनता और जिम्मेदारों की निष्क्रियता के कारण अभियान कागजों तक सीमित होकर रह गया है, जबकि शहर के युवा स्वयं श्रमदान कर व्यवस्था को आईना दिखा रहे हैं.
शहर की जीवनदायिनी सीवन नदी की बदहाली दूर करने के लिए जहां प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस पहल दिखाई नहीं दी, वहीं सीवन पुत्र और सीवन योद्धा नाम से जुड़े युवाओं ने मोर्चा संभाल लिया. पिछले 41 दिनों से लगातार श्रमदान कर रहे इन युवाओं ने नदी के कई घाटों की तस्वीर बदल दी है. बुधवार को यह अभियान 42वें दिन में प्रवेश कर गया.
युवाओं की मेहनत से हनुमान फाटक, महिला घाट, हाथी घाट और बैंगन घाट जैसे क्षेत्रों में साफ-सफाई और गहरीकरण का कार्य तेजी से किया जा रहा है. सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप चावड़ा और उनके साथियों के नेतृत्व में हनुमान फाटक क्षेत्र में नदी का गहरीकरण किया जा रहा है, जबकि लक्कड़पुल क्षेत्र में पिचिंग का कार्य भी जारी है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रशासनिक सहयोग मिलता तो यह अभियान और व्यापक रूप ले सकता था.
एक ओर युवा नदी बचाने की मुहिम चला रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शहर के मण्डी क्षेत्र के ऐतिहासिक कुएं बदहाली का शिकार बने हुए हैं. कभी पूरे शहर की प्यास बुझाने वाले ये कुएं आज गंदगी, काई और मिट्टी से पटे पड़े हैं. बुजुर्ग बताते हैं कि जब पार्वती नदी से जल सप्लाई की व्यवस्था नहीं थी, तब नागरिकों ने चंदा एकत्र कर और रात-रात भर मेहनत करके इन कुओं की खुदाई करवाई थी. उस दौर में यही कुएं शहर के पेयजल का प्रमुख स्रोत हुआ करते थे.
सरकार के जल गंगा संवर्धन अभियान का उद्देश्य जल संरचनाओं का पुनर्जीवन, गहरीकरण, साफ-सफाई और अतिक्रमण हटाना था। नागरिकों को उम्मीद थी कि इस अभियान के तहत सीहोर की ऐतिहासिक बावडिय़ों और कुओं का भी जीर्णोद्धार किया जाएगा, लेकिन धरातल पर तस्वीर इसके विपरीत नजर आ रही है. सरकारी फाइलों में अभियान भले ही सक्रिय हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अधिकांश जल स्रोत प्रशासन की अनदेखी का शिकार बने हुए हैं.
लोगों का कहना है कि समय रहते ऐतिहासिक जल संरचनाओं को नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढिय़ां केवल इनके किस्से ही सुन पाएंगी. फिलहाल, सीवन पुत्रों और युवाओं की मेहनत ही इस अभियान की वास्तविक तस्वीर बनकर सामने आ रही है.
अकेले मंडी क्षेत्र में ही 15 से अधिक प्राचीन कुएं मौजूद
मण्डी क्षेत्र में करीब 15 से अधिक ऐतिहासिक कुएं मौजूद हैं, लेकिन आज इनकी हालत बेहद खराब हो चुकी है. फ्रीगंज क्षेत्र में नेमी की दुकान के पास स्थित कुआं, गणेश मंदिर के सामने और भीतर के कुएं, गल्ला मण्डी की बावड़ी, वर्कशॉप रोड स्थित जीन वाला कुआं तथा वर्कशॉप कॉलोनी के पीछे स्थित कुएं उपेक्षा के कारण अपनी पहचान खोते जा रहे हैं. इन जल स्रोतों के संरक्षण की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए.
