अजा-जजा एक्ट : विवेचना थाना प्रभारी नहीं, उप पुलिस अधीक्षक करेंगे

जबलपुर। हाईकोर्ट के जस्टिस हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने अजा-जजा (अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति) अत्याचार निवारण अधिनियम के प्रकरणों की विवेचना उप पुलिस अधीक्षक (डीएसपी) स्तर के अधिकारी से कराए जाने संबंधी वैधानिक प्रविधान को दोहराते हुए शाहडोल के पुलिस अधीक्षक को दो सप्ताह के भीतर इसकी समीक्षा कर आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने विनय सिंह करछाम की याचिका का आंशिक निराकरण करते हुए कहा कि यदि विवेचना अभी तक डीएसपी स्तर के अधिकारी को नहीं सौंपी गई है तो नियम- सात के अनुरूप तत्काल सक्षम अधिकारी को हस्तांतरित की जाए।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता संदीप दुबे ने न्यायालय को बताया कि 27 मई 2025 को हुई घटना के बाद गोहपारू थाना पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की। पुलिस अधीक्षक से शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं होने पर विशेष न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत किया गया, जिसके आदेश पर 30 जनवरी 2026 को एफआईआर दर्ज हुई। इसके बावजूद विवेचना थाना प्रभारी द्वारा की जा रही है, जबकि अजा-जजा अत्याचार निवारण नियम- 1995 के नियम-सात के अनुसार ऐसे मामलों की विवेचना उप पुलिस अधीक्षक से कम रैंक का अधिकारी नहीं कर सकता। राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता प्रियंका मिश्रा ने कहा कि एफआईआर दर्ज हो चुकी है और विवेचना विधि के अनुसार जारी है। आरोपियों की गिरफ्तारी, पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई तथा विवेचना की न्यायिक निगरानी के लिए कोई असाधारण परिस्थिति या दुर्भावना का प्रमाण उपलब्ध नहीं है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि एफआईआर दर्ज न होने की शिकायत का निराकरण हो चुका है, लेकिन नियम-सात का पालन सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है। इसी आधार पर पुलिस अधीक्षक शाहडोल को दो सप्ताह के भीतर विवेचना की समीक्षा कर आवश्यक होने पर उसे उप पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारी को सौंपने के निर्देश दिए गए। साथ ही कहा गया कि विवेचना निष्पक्ष, स्वतंत्र एवं शीघ्र पूरी की जाए। न्यायालयश् ने आरोपियों की गिरफ्तारी, स्वतंत्र पर्यवेक्षण तंत्र गठित करने व पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की मांग अस्वीकार कर दी।

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