अमित शाह या नीतीश कुमार को उप प्रधानमंत्री बनाने को लेकर तेज हुई चर्चा

प्रवेश कुमार मिश्र नई दिल्ली। केन्द्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार की तैयारियों के बीच अचानक गृहमंत्री अमित शाह और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार में से किसी एक को उपप्रधानमंत्री बनाए जाने की बात राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है. राजनीतिक जानकार बता रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भाजपा की दीर्घकालिक योजना मिशन 2029 को सफल बनाने तथा पार्टी में दूसरी पीढ़ी के नेतृत्व को स्थापित करने के साथ-साथ प्रशासनिक और संगठनात्मक कार्यों के बीच एक सशक्त सेतु बनाने के उद्देश्य से प्रशासनिक और राजनीतिक दृष्टि से सरकार और कैबिनेट समितियों में प्रधानमंत्री मोदी के बाद सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली स्थिति में स्थापित अमित शाह को उपप्रधानमंत्री बनाकर बड़ा संदेश दे सकते हैं.

हालांकि इस बारे में कोई औपचारिक संकेत नहीं दिया जा रहा है लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस विषय को लेकर बहुस्तरीय चर्चा हो रही है. इतना ही नहीं राजग गठबंधन में सबसे अनुभवी नेता बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेकर भी इसी तरह की चर्चा हो रही है. कहा जा रहा है कि जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा सदस्य के तौर पर केन्द्रीय राजनीति में वापसी कर रहे थे उस समय संभवतः भाजपाई रणनीतिकारों ने उन्हें कोई बड़ा और सम्मानजनक पद देने की बात कही थी. हालांकि इस तरह के वादों के संदर्भ में औपचारिक पुष्टि अभी तक न तो जदयू और ना ही भाजपा की ओर से की गई है

लेकिन अनौपचारिक बातचीत में जदयू के कई वरिष्ठ नेताओं ने इसको लेकर इशारा किया है. इतना ही नहीं पिछले कुछ दिनों से जदयू के दूसरे क्रम के कई नेता नीतीश कुमार के अनुभवों को आधार बनाकर उन्हें उपप्रधानमंत्री बनाने की वकालत भी कर रहे हैं. इस संदर्भ में राजनीतिक जानकार यह भी कह रहे हैं कि बिहार जैसे राजनीतिक रूप से सक्रिय बड़े प्रदेश से अभी तक कोई भी प्रधानमंत्री या उपप्रधानमंत्री नहीं बना है ऐसे में संभव है कि गठबंधन सहयोगियों के बीच एक मजबूत और विश्वसनीय संदेश को स्थापित करने के साथ-साथ क्षेत्रीय व राजनीतिक संतुलन को स्थापित करने के लिए नरेंद्र मोदी कोई अप्रत्याशित फैसला कर लें.

जानकार बता रहे हैं कि भारतीय राजनीतिक इतिहास गवाह है कि उप-प्रधानमंत्री का पद हमेशा गठबंधन को बचाए रखने या पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन साधने के लिए दिया गया है. 1989 में वी.पी. सिंह सरकार में चौधरी देवीलाल और 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में लालकृष्ण आडवाणी को यह पद दिया गया था. वाजपेयी-आडवाणी के दौर में आडवाणी को उपप्रधानमंत्री बनाना पार्टी के भीतर उनके कद और उत्तराधिकार की स्पष्ट रेखा तय करना था. बहरहाल, उक्त सभी कयास और चर्चाएं दिल्ली की राजनीतिक गलियारों में चल रहे गंभीर मंथन और वरिष्ठ नेताओं के तर्कसंगत विमर्श के बाद आरंभ हुई है.

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