वाशिंगटन, 01 जुलाई (वार्ता) केंद्रीय खुफिया एजेंसी (सीआईए) के निदेशक जॉन रेटक्लिफ ने चेतावनी दी है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित उपकरण ‘डिजिटल परमाणु हथियार’ बन सकते हैं।
श्री रेटक्लिफ ने वाशिंगटन में मंगलवार को ‘अमेज़न वेब सर्विसेज’ शिखर सम्मेलन के दौरान कहा कि अमेरिका और उसके विरोधियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में एआई एक निर्णायक कारक बनता जा रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि प्रौद्योगिकी में तेजी से हो रही प्रगति वैश्विक शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे सकती है और साइबर युद्ध के भविष्य को पूरी तरह बदल सकती है।
सीआईए प्रमुख ने कहा, “एआई के उपकरण अमेरिका और उसके विरोधी देशों के बीच मुकाबले को और तेज और कठिन बना देंगे। एआई की ताकत इतनी बड़ी है कि इसे डिजिटल परमाणु हथियारों जैसा माना जा सकता है।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विरोधी देश अपने फायदे के लिए अमेरिका की तकनीकी प्रगति को चुराने और उसका गलत इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं।
पिछले महीने ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, ब्रिटेन और अमेरिका के ‘फाइव आइज’ खुफिया गठबंधन ने चेतावनी दी थी कि एआई के नये और अधिक उन्नत मॉडल उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। उनका कहना था कि ये तकनीक साइबर हमलों और साइबर सुरक्षा, दोनों के तरीके को पूरी तरह बदल सकती है। गठबंधन ने यह भी कहा कि यह बदलाव कई सालों में नहीं, बल्कि कुछ ही महीनों में देखने को मिल सकता है।
इसी तरह की चिंता हाल ही में अमेरिकी सीनेटर मार्क वार्नर ने भी जतायी थी। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के प्रमुख टिमोथी हॉघ ने कहा था कि एंथ्रोपिक के उन्नत ‘माइथोस 5’ मॉडल ने एक नियंत्रित परीक्षण में बहुत तेजी से गोपनीय प्रणालियों की कमजोरियां ढूंढ लीं।
न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक यह असली हैकिंग नहीं थी, बल्कि सिर्फ एक परीक्षण था जिसका मकसद एआई की मदद से साइबर सुरक्षा की कमजोरियों को पहचानना था।
एआई के क्षेत्र में अमेरिका और चीन के बीच मुकाबला तेजी से बढ़ रहा है। चीनी कंपनी ‘डीपसीक’ ने जनवरी 2025 में सबको चौंका दिया, जब उसके आर1 और वी3 मॉडल ने बहुत कम लागत में अमेरिकी एआई प्रणालियों जैसी क्षमता दिखाई। लेकिन अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि कंपनी ने यह तकनीक अपने दम पर नहीं बनाई, बल्कि अमेरिकी काम और तकनीक की नकल करके इसे तैयार किया है।
