नयी दिल्ली, 23 जून (वार्ता) प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष प्रोफेसर एस महेंद्र देव ने कहा है कि विकसित भारत 2047 के तीन महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं, पहला, एक विकसित राष्ट्र बनना, दूसरा, रोजगार और मानव विकास के मामले में समावेशन और तीसरा लक्ष्य टिकाऊ तथा जलवायु-अनुकूल तरीकों से इन दोनों लक्ष्यों को प्राप्त करने का है। फिक्की के ‘इंडिया इनोवेटिव क्रॉप न्यूट्रिशन कॉन्क्लेव 2026’ को संबोधित करते हुए श्री देव ने कहा, “हमें कृषि की पूरी सोच को बदलना होगा और केवल पैदावार बढ़ाने वाले दृष्टिकोण से ध्यान हटाना होगा। इसके लिए तीन बातें अहम हैं। इनमें पहली, कटाई के बाद की गतिविधियों और विपणन पर ध्यान देना दूसरी, अधिक आय और रोजगार के लिए खाद्य और कृषि प्रसंस्करण जरूरी हैं और तीसरी बात यह है कि छोटे किसानों को मार्केटिंग में सहायता की आवश्यकता है, जिसके लिए हमें उन्हें संगठित करने के लिए किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और सहकारी समितियों की आवश्यकता है।”
उर्वरक की खपत पर बोलते हुए प्रोफेसर देव ने कहा कि कृषि क्षेत्र में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने की आवश्यकता है। उन्होंने सब्सिडी के माहौल से प्रोत्साहन-आधारित माहौल की ओर बढ़ने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि उर्वरक क्षेत्र के सुधार, जिसमें नीम-लेपित यूरिया, उर्वरक प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, नैनो यूरिया, पीएम-प्रणाम, प्राकृतिक खेती के प्रोत्साहन और पोषक तत्व आधारित सब्सिडी की व्यवस्था, सही दिशा में उठाए गए कदम हैं। प्रोफेसर देव ने कहा, “हमें एक ‘राष्ट्रीय पोषक तत्व उपयोग दक्षता पहल’ पर विचार करना चाहिए जो ध्यान उर्वरक की खपत की मात्रा से हटाकर उससे उत्पन्न पैदावार पर केंद्रित करे। हमें कार्बन क्रेडिट की तरह ही एक ‘पोषक तत्व क्रेडिट प्रणाली’ के विचार पर भी विचार करना चाहिए, जिसमें किसान और कृषि-इनपुट कंपनियां मिट्टी के जैविक कार्बन को बढ़ाने और संतुलित सूक्ष्म पोषक तत्वों को तैनात करने के लिए वित्तीय क्रेडिट कमा सकें।”
सार्वजनिक-निजी भागीदारी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए प्रोफेसर देव ने कहा कि फसल पोषण को एक मुख्य ईएसजी (पर्यावरण, सामाजिक और शासन) संपत्ति वर्ग के रूप में बनाना चाहिए। उन्होंने कहा, “इसे साकार करने के लिए, हमें जैविक और बायोस्टिमुलेंट्स के लिए घरेलू विनिर्माण केंद्रों को बढ़ावा देने और उनका विस्तार करने के लिए एक मजबूत मिश्रित सार्वजनिक-निजी वित्त कोष की आवश्यकता है। हमें सब्सिडी से प्रोत्साहन की ओर, मात्रा से मूल्य की ओर, और टन प्रति हेक्टेयर से पोषक तत्व घनत्व प्रति रुपये की ओर बढ़ने जैसे विचारों पर भी काम करने की आवश्यकता है ताकि देश की बेहतर सेवा की जा सके।” उन्होंने फिक्की से कृषि, कृषि-तकनीक और नवाचार में भागीदारी को बढ़ावा देकर भारतीय कृषि को अधिक लचीला बनाने की दिशा में काम करने का भी आग्रह किया।
इस अवसर पर कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के कृषि आयुक्त डॉ. पी के सिंह ने कहा कि नवाचारों का मौजूदा कृषि पद्धतियों के मुकाबले ठीक से मूल्यांकन किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “एक नई तकनीक को तभी सफल माना जाएगा जब वह किसानों को मौजूदा समाधानों की तुलना में बेहतर परिणाम देगी। इसके अलावा, नियामक प्रणाली को किसानों के हितों की रक्षा करते हुए नवाचार को प्रोत्साहित करना चाहिए।” फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महानिदेशक डॉ. सुरेश कुमार चौधरी ने अपने संबोधन में कहा, “कृषि, कृषि-तकनीक, विज्ञान और नवाचार के बीच स्थायी साझेदारी के माध्यम से भारतीय कृषि अधिक लचीली बनेगी। हम अब अभिनव समाधानों द्वारा संचालित कृषि के भविष्य की नई कल्पना कर रहे हैं।”
फिक्की टास्क फोर्स ऑन इनोवेटिव क्रॉप न्यूट्रिशन के अध्यक्ष और यारा इंडिया के कंट्री हेड संजीव कंवर ने कहा, “अभिनव गैर-सब्सिडी वाले उर्वरकों को अधिक अपनाने से मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार होगा और सब्सिडी वाले उर्वरकों के उपयोग में भी कमी आएगी। ऐसे समाधान पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ाने, टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने और भारतीय कृषि की दीर्घकालिक उत्पादकता और लचीलेपन का समर्थन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।” फिक्की की महानिदेशक ज्योति विज ने कहा कि निजी क्षेत्र को उत्पाद नवाचार, क्षेत्रीय सत्यापन और किसान जुड़ाव को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा, “सार्वजनिक-निजी सहयोग मिलकर एक ऐसा सक्षम पारिस्थितिकी तंत्र बना सकता है जो नवाचार को गति देता है, उसे अपनाने के दायरे को बढ़ाता है और किसानों तथा पर्यावरण के लिए मापने योग्य परिणाम देता है। इस कार्यक्रम के दौरान, फिक्की-यस बैंक की रिपोर्ट, ‘इनोवेटिव क्रॉप न्यूट्रिशन: अनलॉकिंग प्रोडक्टिविटी, प्रॉफिटेबिलिटी एंड रेजिलिएंस इन इंडियन एग्रीकल्चर’ जारी की गई। यस बैंक के राष्ट्रीय प्रमुख (खाद्य और कृषि व्यवसाय रणनीतिक सलाहकार और अनुसंधान) संजय वुप्पुलुरी ने रिपोर्ट पर प्रकाश डालते हुए भारत में फसल पोषण को उर्वरक-केंद्रित मानसिकता से एकीकृत फसल पोषण प्रबंधन दृष्टिकोण में बदलने की आवश्यकता पर बल दिया।

