रांची | झारखंड के एक साधारण आदिवासी परिवार से ताल्लुक रखने वाली विनीता सोरेन ने अपनी मेहनत और अटूट साहस के बल पर माउंट एवरेस्ट फतह कर इतिहास रच दिया है। सीमित संसाधनों और गरीबी को पीछे छोड़ते हुए विनीता ने महज 25 साल की उम्र में दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा फहराया। उनकी यह उपलब्धि न केवल उनके परिवार के लिए, बल्कि पूरे आदिवासी समाज और देश के युवाओं के लिए गर्व का क्षण है।
कठोर प्रशिक्षण और संघर्षपूर्ण सफर
विनीता की यह सफलता सात साल की कठिन तपस्या का परिणाम है। बछेंद्री पाल के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण प्राप्त करने वाली विनीता के लिए यह सफर आसान नहीं था। भीषण ठंड, बर्फीले तूफानों और मानसिक चुनौतियों का सामना करते हुए उन्होंने साबित किया कि दृढ़ इच्छाशक्ति के सामने कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। 26 मई 2012 को उन्होंने अपने साथियों के साथ एवरेस्ट के शिखर को छूकर अपनी क्षमता का लोहा मनवाया।
युवाओं और महिलाओं के लिए प्रेरणा
विनीता सोरेन की यात्रा केवल एवरेस्ट तक सीमित नहीं रही, उन्होंने भुज से वाघा बॉर्डर तक 2,000 किलोमीटर की साहसिक यात्रा भी सफलतापूर्वक पूरी की है। आज वे उन लाखों आदिवासी लड़कियों के लिए एक जीवंत प्रेरणा हैं जो अभावों के बावजूद बड़े सपने देखती हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि सामाजिक सीमाओं और कठिन परिस्थितियों को पार करके सफलता की नई ऊंचाइयों को छुआ जा सकता है।

