नई दिल्ली | भारत में लू का प्रकोप अब राजस्थान और मध्य भारत के शुष्क इलाकों से आगे बढ़कर हिमालयी क्षेत्रों और दक्षिण भारत तक पहुँच चुका है। 2024 में देश में अब तक का सर्वाधिक तापमान दर्ज किया गया, जहाँ हीटवेव की घटनाओं में पिछले वर्षों की तुलना में दोगुना से अधिक वृद्धि देखी गई। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, कर्नाटक और केरल जैसे राज्य, जो पारंपरिक रूप से ठंडे माने जाते थे, अब भीषण गर्मी की चपेट में हैं।
विकास के लिए बढ़ती चुनौती
हीटवेव का सीधा असर सार्वजनिक स्वास्थ्य, श्रम उत्पादकता और कृषि अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट, एंड वॉटर (CEEW) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 57 प्रतिशत जिले अत्यधिक गर्मी के खतरों से जूझ रहे हैं, जहाँ देश की अधिकांश आबादी निवास करती है। जलवायु विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि गर्मी अब एक मौसमी समस्या न रहकर एक दीर्घकालिक संकट बन चुकी है, जो खाद्य सुरक्षा और वित्तीय स्थिरता को प्रभावित कर रही है।
वित्तपोषण का गंभीर अभाव
सरकारी प्रयासों में सुधार के बावजूद, भारत में गर्मी से निपटने के लिए कोई समर्पित राष्ट्रीय वित्तीय ढांचा मौजूद नहीं है। केंद्रीय बजट की 130 सरकारी योजनाओं के विश्लेषण से पता चला कि आवंटित बजट का केवल 10 प्रतिशत हिस्सा ही गर्मी से जुड़े खतरों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निपटने में सक्षम है। भविष्य में इस बढ़ते खतरे का सामना करने के लिए व्यापक नीति और ठोस बजट आवंटन की तत्काल आवश्यकता है।

