
नीमच। शहर की पहचान और लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र मानी जाने वाली गांधी वाटिका में बेजुबान जीवों की हालत को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मौके से सामने आई तस्वीरें और स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी गांधी वाटिका की बदहाल व्यवस्था की कहानी बयां कर रही हैं। आरोप हैं कि यहां रखी गई बत्तखों को साफ पानी तक नसीब नहीं हो रहा, जबकि भीषण गर्मी में उन्हें लोहे की चादरों से बने छोटे पिंजरों में रहने को मजबूर किया जा रहा है।
स्थानीय लोगों के अनुसार बत्तखों के लिए बने जलाशय का पानी पूरी तरह काई से भर चुका है। इसके बावजूद उसी पानी की अभी तक सफाई की सुध नहीं ली जा रही है और पीने के लिए भी स्वच्छ पानी की समुचित व्यवस्था दिखाई नहीं दे रही।
काई भरे पानी में गुजर रहा जीवन
मौके पर मौजूद लोगों का कहना है कि बत्तखों के लिए बना जल क्षेत्र लंबे समय से साफ नहीं किया गया है। पानी में काई जम चुकी है और बदबू भी महसूस की जा सकती है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि:
जलाशय की नियमित सफाई नहीं हो रही।
बत्तखों को स्वच्छ पानी उपलब्ध नहीं कराया जा रहा।
बदबूदार और गंदे पानी में ही उन्हें रहना पड़ रहा है।
गर्मी के मौसम में स्थिति और अधिक गंभीर हो गई है।
पशु प्रेमियों का मानना है कि ऐसी परिस्थितियां पक्षियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं।
तपते पिंजरों में कैद बेजुबान
स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार बत्तखों को लोहे की चादरों से बने छोटे पिंजरों में रखा गया है। गर्मी के दिनों में ये पिंजरे अत्यधिक गर्म हो जाते हैं। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि दोपहर के समय इन पिंजरों के आसपास खड़ा होना भी मुश्किल होता है। ऐसे में अंदर बंद बत्तखों की स्थिति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। लोगों का सवाल है कि यदि गांधी वाटिका में पशु-पक्षियों को रखा गया है तो उनके लिए अनुकूल वातावरण और पर्याप्त देखभाल की व्यवस्था क्यों नहीं है।
एक बत्तख गंभीर हालत में मिली
स्थानीय लोगों ने दावा किया कि एक बत्तख काफी कमजोर अवस्था में एक कोने में पड़ी हुई दिखाई दी। लोगों का कहना है कि उसकी स्थिति चिंताजनक नजर आ रही थी। हालांकि इस संबंध में किसी चिकित्सकीय जांच या आधिकारिक पुष्टि की जानकारी सामने नहीं आई है।
पिंजरों में घूम रहे चूहे
मामले का एक और चिंताजनक पहलू पिंजरों के भीतर चूहों की मौजूदगी बताई जा रही है।
स्थानीय लोगों के अनुसार:
पिंजरों में चूहों की आवाजाही देखी गई।
इससे बत्तखों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
भोजन और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी बढ़ सकते हैं।
स्थानीय लोगों ने कहा- कई बार अधिकारियों को बता चुके
जब इस विषय में वहां मौजूद स्थानीय लोगों से चर्चा की गई तो उन्होंने दावा किया कि वे कई बार संबंधित अधिकारियों को स्थिति से अवगत करा चुके हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, उन्होंने बार-बार बत्तखों की स्थिति और व्यवस्था सुधारने की आवश्यकता बताई, लेकिन अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
यदि स्थानीय लोगों का दावा सही है तो सवाल यह उठता है कि शिकायतों के बावजूद हालात क्यों नहीं सुधरे।
जिम्मेदार व्यक्ति के बयान पर उठे सवाल
मामले में जब जिम्मेदार व्यक्ति महावीर जी से चर्चा की गई तो उन्होंने शुरुआत में ऐसी किसी भी समस्या से इनकार किया। स्थानीय सूत्रों के अनुसार जब उन्हें स्थिति से जुड़े प्रमाण होने की बात कही गई तो उन्होंने कथित रूप से कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराया।
नगर पालिका प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल
गांधी वाटिका की मौजूदा स्थिति को लेकर स्थानीय लोगों ने नगर पालिका प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि नगर पालिका अध्यक्ष स्वाति चोपड़ा समय-समय पर शहर और गांधी वाटिका में आयोजित बैठकों एवं विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होती हैं। साथ ही इन आयोजनों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी साझा की जाती हैं। हालांकि नागरिकों का आरोप है कि वाटिका में मौजूद जीव-जंतुओं की स्थिति और लगातार बिगड़ती व्यवस्थाओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि गांधी वाटिका शहर की प्रमुख पहचान है तो यहां रखे गए बेजुबान जीवों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और रखरखाव भी प्रशासन की प्राथमिकताओं में होना चाहिए।
शहर की पहचान पर लग रहे सवाल
गांधी वाटिका को नीमच शहर की प्रमुख सार्वजनिक पहचान माना जाता है। यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग घूमने और समय बिताने पहुंचते हैं। ऐसे में यहां की बदहाल व्यवस्थाएं केवल पशु कल्याण का विषय नहीं बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही का भी मुद्दा बन गई हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बेजुबान जीव अपनी परेशानी स्वयं नहीं बता सकते, इसलिए उनकी देखभाल की जिम्मेदारी पूरी तरह उन लोगों पर है जिन्हें इसके लिए नियुक्त किया गया है।
