खाद्य प्रणाली में बदलाव से दक्षिण एशिया में बन सकते हैं लाखों रोजगार, अरबों डॉलर के निवेश के अवसर : विश्व बैंक समूह

नयी दिल्ली/ अहमदाबाद, 10 जून (वार्ता) विश्व बैंक समूह ने भारत सहित दक्षिण एशियाई क्षेत्र में कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ साथ खाद्य प्रसंस्करण , व्यापार और नव-प्रवर्तन के रूप में खेत से बाजार के बीच की कड़ियों में नये बदलाव लाने की सिफारिश करते हुए कहा है कि इससे खाद्य प्रणाली में होने वाले परिवर्तनोंं से रोज़गार, निवेश, आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन के महत्वपूर्ण अवसर खुल सकते हैं।

विश्वबैंक समूह की पहल दक्षिण एशियाई में पोषण और विकास के लिए उत्तम नीतिगत- नेतृत्व (सैपलिंग) और खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय द्वारा अहमदाबाद में बुधवार को सम्पन्न दो दिन के संवाद कार्यक्रम में कहा गया कि दक्षिण एशिया अपने विकास के महत्वपूर्ण मोड़ पर है , हर वर्ष लाखों युवा कार्यबल में शामिल हो रहे हैं, ऐसे में स्थायी रोज़गार सृजन इस क्षेत्र की सबसे अहम प्राथमिकताओं में से एक बन चुका है।

सैपलिंग मंच नीतिगत सुधारों को बढ़ावा देने, निवेश के अवसर विकसित करने और सफल समाधानों को पूरे क्षेत्र में विस्तारित करने के लिए सरकारों, निवेशकों, विकास भागीदारों और नवप्रवर्तकों को विचार-विमर्श के लिए एक स्थान पर लाता है। इस सम्मेलन में सैपलिंग उच्च स्तरीय नीति संवाद में भाग लेने वालों ने सरकारों, व्यवसायों, निवेशकों और विकास संस्थानों द्वारा समन्वित कार्रवाई के महत्व पर प्रकाश डाला। इसका विषय था ” मूल्य अर्जित करने का अवसर : दक्षिण एशिया में रोजगार सृजन और सतत विकास के लिए खाद्य प्रसंस्करण को आगे बढ़ाना”

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की बुधवार को जारी एक विज्ञप्ति के अनुसार इस क्षेत्र में कृषि क्षेत्र का वार्षिक मूल्य 700 अरब डॉलर से अधिक है और यह लगभग 43 प्रतिशत कार्यबल को रोजगार प्रदान करता है। हालांकि, अपने विशाल आकार के बावजूद, कृषि इस क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में केवल 16 प्रतिशत का योगदान देती है। दक्षिण एशिया में उत्पादित भोजन का 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हर वर्ष बर्बाद हो जाता है जबकि यह लगभग 30 करोड़ लोगों के लिए पर्याप्त है।

संवाद में शामिल विशेषज्ञों ने कहा कि कृषि परिवर्तन की अगले चरण की उपयोगिता केवल उत्पादन बढ़ाने में ही नहीं, बल्कि खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, रसद, विपणन और मूल्यवर्धन के विस्तार में भी निहित है। इन गतिविधियों से लाखों उत्पादक रोज़गार सृजित हो सकते हैं। इससे खाद्य हानि कम हो सकती है और किसानों की आय में वृद्धि हो सकती है।

भारत में खाद्यान्न उत्पादन वर्ष 1950-51 में 5.1 कराेड़ टन से बढ़कर आज 33 करोड़ टन से अधिक हो गया है। पिछले दशक में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का निर्यात भी दोगुने से अधिक हो गया है, जो लगभग 4.9 अरब डॉलर से बढ़कर 10 अरब डॉलर से अधिक हो गया है। खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र वर्तमान में विनिर्माण मूल्यवर्धन में लगभग 9 प्रतिशत और भारत के निर्यात में लगभग 13 प्रतिशत का योगदान देता है।

संवाद में कहा गया कि भारत का अनुभव दर्शाता है कि रणनीतिक नीतिगत हस्तक्षेप कृषि मूल्य श्रृंखलाओं को किस प्रकार रूपांतरित कर सकते हैं। प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना, प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों के औपचारिकरण (पीएमएफएमई) योजना और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के लिए उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना जैसी प्रमुख पहलों ने बुनियादी ढांचे को मजबूत किया है, उद्यमों का आधुनिकीकरण किया है, निवेश आकर्षित किया है तथा प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार किया है।

विज्ञप्ति के अनुसार संवाद में कहा गया कि इस प्रगति के बावजूद, महत्वपूर्ण अवसर अभी भी उपस्थित हैं। खाद्य प्रसंस्करण वर्तमान में कुल रोजगार का एक छोटा हिस्सा है और कृषि उत्पादों का एक बड़ा हिस्सा अभी भी असंसाधित है। कोल्ड चेन, भंडारण सुविधाओं, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और बाजार संबंधों को मजबूत करने से इस क्षेत्र में मूल्य सृजन में काफी वृद्धि हो सकती है।

इसमें कहा गया है कि दक्षिण एशिया में खाद्य प्रणालियों के क्षेत्र में वैश्विक प्रमुख रूप से उभरने की प्रबल संभावनाएं हैं। तीव्र शहरीकरण, बढ़ते मध्यम वर्ग, समृद्ध कृषि-जैव विविधता और सुरक्षित एवं उच्च गुणवत्ता वाले प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग निवेश और नवाचार के नये अवसरों का सृजन कर रही है।

इस परिवर्तन को गति देने के लिए, विश्व बैंक समूह एग्रीकनेक्ट और सैपलिंग के माध्यम से एक संयुक्त दृष्टिकोण को आगे बढ़ा रहा है। एग्रीकनेक्ट, एक वैश्विक मंच, बुनियादी ढांचे में निवेश, नीतिगत सुधारों और निजी पूंजी जुटाने के माध्यम से वर्ष 2030 तक 3 करोड़ किसानों को बाजारों से जोड़ने का लक्ष्य रखता है। यह पहल पहले से ही भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका सहित कई देशों में परियोजनाओं और सुधारों का समर्थन कर रही है।

चर्चा के दौरान निवेशकों को कोल्ड चेन, वेयरहाउसिंग, लॉजिस्टिक्स हब, प्रोसेसिंग क्लस्टर, कृषि-औद्योगिक पार्क और उभरते कृषि उद्यमों का समर्थन करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। कंपनियों से एकीकृत मूल्य श्रृंखला बनाने, उद्गम क्षेत्र की पहचान और गुणवत्ता आश्वासन के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकियों को अपनाने और कार्यबल कौशल और क्षमता निर्माण में निवेश करने का आग्रह किया गया।

विशेषज्ञों ने कहा कि नीति निर्माता खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्रों को बढ़ावा देकर, लॉजिस्टिक्स बुनियादी ढांचे में सुधार करके, खाद्य सुरक्षा और प्रमाणन प्रणालियों को सरल बनाकर, सार्वजनिक-निजी भागीदारी को मजबूत करके और अधिक निवेश-अनुकूल व्यावसायिक वातावरण बनाकर प्रगति को गति दे सकते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थान मिश्रित वित्त तंत्रों का विस्तार करके, निवेश के अवसरों से जुड़े नीतिगत सुधारों का समर्थन करके और खाद्य प्रणालियों में निजी क्षेत्र के निवेश से जुड़े जोखिमों को कम करके उत्प्रेरक भूमिका निभा सकते हैं। संवाद में इस बात पर बल दिया कि दक्षिण एशिया की खाद्य अर्थव्यवस्था का भविष्य केवल उत्पादन तक ही सीमित नहीं है। कृषि से लेकर बाज़ार तक खाद्य प्रणालियों में परिवर्तन करके, यह क्षेत्र लाखों रोज़गार सृजित कर सकता है, खाद्य हानि को कम कर सकता है, पोषण में सुधार कर सकता है, निवेश आकर्षित कर सकता है, निर्यात को मज़बूत कर सकता है और आने वाले दशकों तक समावेशी आर्थिक विकास को गति दे सकता है।

 

 

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