हैदराबाद | राम चरण और जाह्नवी कपूर की आगामी फिल्म ‘पेद्दी’ इन दिनों अपने आपत्तिजनक दृश्यों के कारण चर्चा में है। फिल्म में जाह्नवी के शरीर को जिस तरह से स्लो-मोशन और कैमरों के माध्यम से ‘ऑब्जेक्टिफाई’ किया गया, उसे लेकर दर्शकों में भारी आक्रोश है। हालांकि विरोध के चलते निर्देशक बुची बाबू सना ने उन दृश्यों को हटाने का निर्णय लिया है, लेकिन यह घटना सिनेमा में महिलाओं को केवल ग्लैमर और पुरुष आकर्षण का साधन बनाए जाने की पुरानी बहस को फिर से जिंदा कर दिया है।
ब्लॉकबस्टर फिल्मों का दोहरा मापदंड
सिनेमाई इतिहास में यह पहली बार नहीं है जब किसी अभिनेत्री को वस्तु के रूप में पेश किया गया हो। ‘देवरा’ में जाह्नवी के सीमित स्क्रीन प्रेजेंस से लेकर ‘पुष्पा’ में रश्मिका मंदाना के किरदारों तक, कई ब्लॉकबस्टर फिल्मों में अभिनेत्रियों का उपयोग केवल नायक को महिमामंडित करने या दर्शकों को लुभाने के लिए किया गया है। यहाँ तक कि ‘ऊ अंटावा’ जैसा गाना, जो पुरुषवादी नजरिए की आलोचना का दावा करता है, वह भी कहीं न कहीं उसी ऑब्जेक्टिफिकेशन का हिस्सा बनकर रह जाता है।
रूढ़िवादी सोच का बढ़ता प्रभाव
‘केजीएफ’ से लेकर ‘एनिमल’ और नंदामुरी बालकृष्ण की फिल्मों तक, यह स्पष्ट है कि व्यावसायिक सफलता के नाम पर आज भी महिलाओं को अक्सर ‘हीरो की प्रेमिका’ या पुरुषों की इच्छाओं को संतुष्ट करने वाली ‘शोपीस’ की तरह ही प्रस्तुत किया जाता है। चाहे वह सांस्कृतिक जड़ों वाली ‘कंतारा’ हो या ‘एनिमल’ जैसी हिंसक ड्रामा, महिला किरदारों के आंतरिक जीवन और उनकी गरिमा को पुरुष प्रधान कहानी के सामने अक्सर हाशिए पर धकेल दिया जाता है, जो एक गंभीर चिंता का विषय है।

