नयी दिल्ली, 31 मई (वार्ता) राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अशोक भूषण ने कहा है कि ‘दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता'(आईबीसी) ने पिछले एक दशक में भारत के वित्तीय परिदृश्य में काफी बदलाव किया है। उन्होंने पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (पीएचडीसीसीआई) द्वारा आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए इस कानून को भारत के सबसे महत्वपूर्ण कानूनी और आर्थिक सुधारों में से एक बताया।
उन्होंने कहा, “आईबीसी ने एक बिखरे हुए और देर से अपनी सेवा देने वाले दिवालियापन ढांचे को एक एकीकृत, लेनदार-संचालित ढांचे में बदल दिया है, जो समय-सीमा के भीतर समाधान और जवाबदेही पर केंद्रित है।
न्यायमूर्ति भूषण ने कहा कि राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) ने पिछले कुछ वर्षों में दिवाला और शोधन अक्षमता न्यायशास्त्र को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय दिवालियापन और समूह दिवालियापन ढांचे को बदलते कारोबारी माहौल में और मजबूत करने की जरूरत पर बल दिया। nउच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजेश बिंदल ने कहा कि दिवालिया तंत्र ने समाधान के परिणामों, सुधारों और संकटग्रस्त उद्यमों के पुनरुद्धार में काफी सुधार किया है और गैर-निष्पादित संपत्तियों को कम करने में भी मदद की है।

