अगरतला, 27 मई (वार्ता) त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने गौतम सरकार को पश्चिम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के अध्यक्ष पद से हटाने के फैसले को यह कहते हुए रद्द कर दिया है कि अधिकारियों ने प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन किया है और उचित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया है।
न्यायमूर्ति डॉ. टी. अमरनाथ गौड़ और न्यायमूर्ति एस. दत्ता पुरकायस्थ की पीठ ने सरकार को सरकार को औपचारिक कारण बताओ नोटिस जारी करने और उसके बाद पद से हटाने के कारणों सहित एक वैध आदेश जारी करने का निर्देश दिया।
न्यायालय ने हालांकि स्पष्ट किया कि पुनर्विचार के दौरान याचिकाकर्ता को अध्यक्ष के रूप में अपने दायित्वों का निर्वहन करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इस निर्णय से प्रशासनिक कानून में अर्ध-न्यायिक भूमिकाओं और संवैधानिक अधिकारों से संबंधित अनुशासनात्मक और पद से हटाने की प्रक्रियाओं में वैधानिक प्रक्रियाओं के पालन और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को बनाए रखने के महत्व पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ने की उम्मीद है।
याचिकाकर्ता गौतम सरकार ने पश्चिम त्रिपुरा जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के अध्यक्ष पद से 12 फरवरी, 2026 को जारी अपनी बर्खास्तगी अधिसूचना के आधार पर हुई जांच की वैधता को चुनौती दी। उन्होंने दावा किया कि उपभोक्ता संरक्षण (राज्य आयोग और जिला आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति के लिए योग्यता, भर्ती विधि, नियुक्ति प्रक्रिया, कार्यकाल, त्यागपत्र और बर्खास्तगी) नियम, 2020 के तहत कुछ शिकायतों और आरोपों के कारण उनके खिलाफ जांच शुरू की गई थी।
अपनी रिट याचिका में गौतम सरकार ने तर्क दिया कि जांच कार्यवाही नियमों की घोर अवहेलना करते हुए और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करते हुए संचालित की गई थी। उन्हें अपना बचाव करने का उचित अवसर नहीं दिया गया, जिसमें गवाहों से जिरह करने और आरोपों का खंडन करने का अधिकार भी शामिल था, जिससे जांच कार्यवाही में उनका प्रभावी योगदान बाधित हुआ।
याचिकाकर्ता ने कहा कि जांच रिपोर्ट मनमाने और पूर्वनिर्धारित तरीके से तैयार और लागू की गई थी।
राज्य सरकार ने सरकार के खिलाफ वादियों, वकीलों और उनके कार्यालय की कई महिला कर्मचारियों की शिकायतों के आधार पर उन्हें बर्खास्त कर दिया। इन शिकायतों में आरोप लगाया गया था कि गौतम सरकार अदालत में पेश होते समय नशे में थे और उन्होंने कार्यस्थल पर शराब का सेवन किया था।
