पवैया अफसरों को अहसास करा रहे “वित्त आयोग” की ताकत का

ग्वालियर चंबल डायरी हरीश दुबे।  शिवराज कैबिनेट में मंत्री और सांसद रह चुके जयभान सिंह पवैया मंदिर आंदोलन में केंद्रीय भूमिका निभाने के चलते राष्ट्रीय स्तर पर तेजतर्रार हिंदुत्ववादी नेता की छवि रखते हैं। उनका कार्यक्षेत्र देशभर में विस्तृत है लेकिन ग्वालियर उनकी प्राथमिकता में है। यही वजह है कि अपनी नियुक्ति के बाद उन्होंने वित्त आयोग की पहली बैठक ग्वालियर में ही रखी। वे वित्त आयोग के पूरे लश्करे लवाजम के साथ आए हैं। खास बात यह कि उन्होंने एक ही दिन में दो बड़ी बैठकें रख लीं, पहली मुरार सर्किट हाउस में तो दूसरी कमिश्नरी में। उन्होंने इन बैठकों में ग्वालियर से ताल्लुक रखने वाले सारे मंत्रियों, सांसद, विधायकों, निकाय अध्यक्षों और आला अफसरों को तलब कर लिया। हालांकि बरसों पहले वित्त आयोग के अध्यक्ष पद को ग्वालियर के ही दिग्गज नेता स्व. शीतला सहाय भी सुशोभित कर चुके हैं लेकिन पवैया के अध्यक्षकाल में पहली बार अफसरों को अहसास हो रहा है कि वित्त आयोग क्या ताकत रखता है और किस हद तक इसकी वजनदारी है।

चंबल की इस नई राजनीतिक जुगलबंदी के निशाने पर कौन ?

दस बरस तक सूबे के वजीरेआला रह चुके राजा अगले महीने राज्यसभा से भी रिटायर हो रहे हैं, उन्होंने अगली पारी खेलने से भी मना किया है लेकिन इस हफ्ते ग्वालियर प्रवास में जिस कदर उन्होंने सक्रियता दिखाई, अपने अजीजों के घर तशरीफ लाए, कांग्रेस दफ्तर पर भी आमद दी, कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी दिखाई दिए, उसे देखकर कहा जा सकता है कि वे राज्यसभा या लोकसभा में रहें अथवा नहीं, उनकी सक्रियता बिना रुके बरकरार रहेगी। खास बात यह है कि वे नाट्यमंचन के एक कार्यक्रम में विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह के साथ भी दिखाई दिए। ऊषा ठाकुर की ही तरह उन्होंने नरेंद्र सिंह को भी सनातनी करार दिया। दो विपरीत राजनीतिक ध्रुवों के नुमाइंदों दिग्विजय और नरेन्द्र सिंह की यह गलबहियां कुछ सियासी इशारा करती हैं, दरअसल राधौगढ़ के राजा और दिमनी के छत्रप की सियासत में जो एक खास गुण सबसे ज्यादा मिलता है, वह है महाराजा की खिलाफत। कांग्रेस में रहते महाराजा और राजा की कभी नहीं पटी तो महाराजा के भाजपा में आने के बाद पार्टी के पुराने छत्रप नरेन्द्र सिंह का उनसे मेल नहीं बैठ पाया है। तो क्या यह नई जोड़ी महाराजा के खिलाफ नई लामबंदी की तैयारी में है।

प्रवीण के बगावती तेवरों से व्हाइट हाउस में बेचैनी

यदि कोई गंभीर अड़चन नहीं आई तो यह तय है कि इलाके के कारोबारियों के सबसे बड़े और करीब सौ साल से ज्यादा पुराने संगठन मप्र चैम्बर ऑफ कॉमर्स के चुनाव 18 जुलाई तक निबटा लिए जाएंगे। चुनावी सरगर्मी शुरू हो चुकी है। सबसे ज्यादा रस्साकसी अध्यक्ष पद पर है। मौजूदा वक्त अध्यक्ष पद पर व्हाइट हाउस के प्रवीण अग्रवाल आसीन हैं। खबर है कि व्हाइट हाउस का मार्गदर्शक मंडल इस बार प्रवीण की जगह प्रशांत गंगवाल के नाम पर दांव खेलने की तैयारी में है लेकिन मौजूदा अध्यक्ष प्रवीण अग्रवाल भी कुर्सी न छोड़ने के लिए कमर कसकर बैठे हैं। बाजार में चर्चा है कि व्हाइट हाउस ने अगली पारी के लिए अविश्वास जताया तो वे निर्दलीय उतरकर ताल ठोकेंगे। वैसे व्हाइट हाउस की तरफ से भूपेंद्र जैन और पारस जैन के नाम भी प्रमुखता से उभरे हैं। भूपेंद्र जैन एक मर्तबा अध्यक्ष का चुनाव लड़ चुके हैं, पिछली बार भी प्रवीण अग्रवाल के चुनाव अभियान की कमान भूपेंद्र ने ही संभाली थी। चेंबर के दूसरे शक्ति केंद्र क्रिएटिव हाउस में फिलवक्त कोई सक्रियता नहीं देखी जा रही है। इस हाउस को चलाने वाले बड़े चेहरे विष्णु गर्ग के निधन के बाद से क्रिएटिव की एक्टिविटीज में पुराने दौर जैसी गर्मजोशी नहीं दिख रही है।

मैं नहीं तो बेटे को ही टिकट दिला दो, मिलवा लाए राहुल से

 

महीना भर से भी ज्यादा वक्त से दतिया विधानसभा सीट खाली है। निवर्तमान विधायक राजेन्द्र भारती की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट में तारीख पर तारीख लग रही है वहीं इस विधानसभा क्षेत्र के रिक्त घोषित होने के बाद चुनाव आयोग ने अपने स्तर पर उपचुनाव की तैयारी शुरू कर दी है। भाजपा और कांग्रेस भी मुस्तैद हैं। भाजपा की तरफ से पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा निर्विवाद उम्मीदवार माने जा रहे हैं तो कांग्रेस में कई दावेदार उभर आए हैं। राजेन्द्र भारती अपने परिवार की इस पारंपरिक सीट पर बेटे को चुनाव लड़ाना चाहते हैं। वे दिल्ली जाकर बेटे को राहुल गांधी से भी मिलवा आए हैं। उधर, पिछले विधानसभा चुनाव के समय कमलनाथ के दिए भरोसे पर टिकट की आस में भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए अवधेश नायक इस बार टिकट के रूप में निष्ठा परिवर्तन का पारितोषण चाहते हैं। दतिया राजपरिवार के कुंवर का नाम भी चल रहा था लेकिन उन्होंने पार्टी से कह दिया है कि वे अपनी पुरानी सीट सेबढ़ा छोड़कर दीगर सीट के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं।

“एल्डरमैन की लिस्ट से खुद कटवा रहे नाम”

करीब एक बरस पहले तक ग्वालियर नगर निगम में एल्डरमैन बनने के लिए भाजपा कार्यकर्ताओं ने सातों घोड़े छोड़ दिए थे लेकिन अब जबकि एल्डरमैन की सूचियां तैयार हैं, यही दावेदार पार्टी से कहकर अपने नाम कटवा रहे हैं। कारण यह गिना रहे हैं कि परिषद का कार्यकाल खत्म होने से पहले सिर्फ कुछ महीनों के लिए यह निरर्थक ताज पहनकर पार्टी के जमा खाते में अपने नाम एंट्री क्यों कराएं। एल्डरमैन के दावेदारों ने अब पार्षदी के चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है ताकि किस्मत ने साथ दिया तो पूरे पांच बरस तक सत्ता सुख भोगने का मौका मिले।

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