हवा, मिट्टी और पानी की चिंता करेंगे तो हो जाएगा पर्यावरण संरक्षण

इंदौर:हमें हवा, मिट्टी और पानी की चिंता करना होगी. जब यह चिंता हम करेंगे तो पर्यावरण का संरक्षण स्वमेव हो जाएगा. केवल पेड़ लगा लेने से ग्रीन कवरेज नहीं होगा। हमें क्षेत्र की तासीर को भी समझना होगा.यह बात राजस्थान के पर्यावरणविद प्रो श्यामसुंदर ज्वाणी ने कही. वे आज यहां अभ्यास मंडल की ग्रीष्मकालीन व्याख्यान माला में जाल सभागृह में संबोधित कर रहे थे. उनका विषय था- पर्यावरण संरक्षण और सामूहिक भागीदारी. उन्होंने अब तक 50 लाख वृक्ष लगाए हैं और 200 वन तैयार किए हैं. उन्होंने कहा कि किसी भी स्थान पर कोई सा भी पौधा नहीं लगाया जाता है.

हमें जमीन की तासीर को समझाना पड़ेगा. हर प्रदेश का नहीं बल्कि हर जिले का मिट्टी का एक अलग स्वभाव होता है. जब हम उस स्वभाव को समझेंगे और उसके हिसाब से पौधा लगाएंगे तो वह पौधा पनपेगा. कई बार हम देखते हैं कि हमने पौधा लगाया लेकिन वह पौधा नहीं पनपा तो उसके पीछे कारण जमीन का स्वभाव होता है. हरियाली को हम केवल इस रूप में नहीं ले सकते कि हमें पर्याप्त ऑक्सीजन मिल जाएं. हमें इसे जीवित तंत्र के रूप में समझना होगा। हमें सोशल इकोलॉजी को समझना चाहिए. क्या कारण है कि हमारे देश में हर प्रदेश का खान-पान अलग है क्योंकि हर प्रदेश में मौसम अलग तरह का होता है और वहां पर शरीर की आवश्यकता भी बदल जाती है.

कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथि का स्वागत सेवानिवृत आईएएस अधिकारी आनंद शर्मा, शफी शेख, द्वारका मालवीय, सुनील साहू ने किया, कार्यक्रम का संचालन स्वप्निल व्यास ने किया। अतिथि परिचय वैशाली खरे ने दिया। स्मृति चिन्ह डॉ ओ पी जोशी और डॉ दिलीप वाघेला ने भेंट किया। अंत में आभार डा शंकर लाल गर्ग ने माना. अभ्यास मंडल की 66वीं ग्रीष्मकालीन व्याख्यान माला का समापन कल गुरुवार को होगा. इस समापन सत्र में लेफ्टिनेंट जनरल ( रिटा.) माधुरी कानिटकर का व्याख्यान होगा.

ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर भूल गए
उन्होंने कहा कि हम ग्रीन इंफ्रास्ट्रख्र को भूल गए हैं यही कारण है कि आज देश के अलग-अलग हिस्से में गर्मी के कारण हीट वेव चल रही है. हमारे देश में हम हर साल करोड़ों पौधे लगाते हैं लेकिन यह ध्यान नहीं देते हैं कि उनमें से कितने पौधे पनप कर पेड़ बन पा रहे हैं. हम क्षेत्र की डिमांड को नजरअंदाज करते हुए अपने काम को करते हैं. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मध्य प्रदेश में घना जंगल होता है यहां पर एक दूसरे के पास में पेड़ लग जाते हैं और पनप जाते हैं लेकिन राजस्थान के रेगिस्तान वाले इलाके में पेड़ों को एक दूसरे से एक निश्चित दूरी बनाकर लगाना पड़ता है. इसके लिए स्थानीय जरूरत को भी समझने की आवश्यकता है. जैव विविधता पर आने वाले नकारात्मक प्रभाव को रोकना भी हमारी जिम्मेदारी है. हमें हवा मिट्टी और पानी की चिंता करना होगी. जब हम यह चिंता करने लगेंगे तो पर्यावरण का संरक्षण होने लगेगा. यह काम किसी एक व्यक्ति के करने से नहीं होगा बल्कि हम सब की सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में हमें करना होगा.

कान्हा नदी के लिए 40 लाख लोग आगे क्यों नहीं आते
अपने भाषण के दौरान ज्याणी ने कहा कि अभ्यास मंडल के सदस्य कान्ह और सरस्वती नदी के शुद्धिकरण के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो मेरा सवाल यह है कि केवल अभ्यास मंडल के 200 लोग ही यह संघर्ष क्यों करें? इंदौर शहर के 40 लाख लोग इस कार्य में सहभागी क्यों नहीं बन रहे हैं। हम सभी को प्रकृति को सही करने की और सजग रहना होगा और प्रकृति का संरक्षण करना होगा.

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