नई दिल्ली | भारतीय रियल एस्टेट बाजार इस समय एक दोराहे पर खड़ा है, जहाँ लक्जरी घरों की इन्वेंट्री में 40% तक का भारी उछाल आया है, वहीं आम आदमी के लिए किफायती घरों की उपलब्धता तेजी से घट रही है। एनारॉक ग्रुप के विशेषज्ञों के अनुसार, वर्ष 2021 में किफायती आवासों की बाजार में हिस्सेदारी 37% थी, जो 2025 की पहली छमाही तक गिरकर मात्र 18% रह गई है। बिल्डर्स द्वारा केवल मुनाफे वाले लक्जरी प्रोजेक्ट्स पर ध्यान केंद्रित करने से मध्यमवर्गीय खरीदार बाजार से बाहर हो रहे हैं, जिससे ‘डिमांड एयर पॉकेट’ जैसी स्थिति पैदा होने का खतरा बना हुआ है।
चीन के रियल एस्टेट बाजार के पतन से तुलना करते हुए विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि भारत का बाजार बुनियादी तौर पर अधिक मजबूत है, क्योंकि यहां की मांग सट्टेबाजी के बजाय वास्तविक ‘एंड-यूजर’ द्वारा संचालित है। हालांकि, दिल्ली-एनसीआर, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे प्रमुख शहरों के माइक्रो-मार्केट्स में कीमतों का 12% से 19% तक बढ़ना ‘ओवरहीटिंग’ के स्पष्ट संकेत हैं। चीन में जनसांख्यिकीय गिरावट और सरकारी नीतियों की विफलता से उपजा संकट भारतीय नीति निर्माताओं के लिए एक चेतावनी है, विशेष रूप से तब जब भारत में बिना बिके घरों की संख्या 5 लाख यूनिट्स के पार पहुंच चुकी है।
आने वाले समय में किसी भी बड़े संकट को टालने के लिए निवेशकों और खरीदारों को बाजार के छह प्रमुख ‘रेड फ्लैग’ पर नजर रखनी होगी। इसमें 18 महीने से अधिक का इन्वेंट्री ओवरहैंग, किफायती घरों की गिरती बिक्री, ईएमआई का आय से अधिक होना और डेवलपर्स पर बढ़ता कर्ज शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बिल्डर्स समय रहते लक्जरी के आकर्षण से बाहर निकलकर मध्यम वर्ग की जरूरतों पर ध्यान नहीं देते हैं, तो वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के चलते भविष्य में कीमतों में 10-15% तक का सुधार (Correction) देखने को मिल सकता है।

