इंदौर: शहर की चर्चित वेटलैंड साइट सिरपुर तालाब, जिसे छोटा सिरपुर और बड़ा सिरपुर तालाब के रूप में जाना जाता है, आज बदहाली का शिकार होता जा रहा है. कुछ वर्ष पहले वेटलैंड घोषित होने के बाद यहां पक्षियों के संरक्षण और सौंदर्यीकरण के नाम पर कई सुविधाएं विकसित की गई थीं, लेकिन अब स्थिति उलट दिखाई दे रही है.
तालाबों में जलकुंभी का कब्जा बढ़ चुका है, गंदा पानी लगातार मिल रहा है, सुरक्षा जाल टूटे पड़े हैं, लाइट पोल से लाइटें गायब हैं और फव्वारे बंद पड़े हैं. लोग तालाब की इज्जत के अंदर पहुंचकर मछलियां पकड़ रहे हैं यहां तक की तालाब के जल में मवेशियों को भी चरवाया जाता है जो यहां के चौकीदारों की जिम्मेदारी है उन्हें हटाया जाए. लेकिन चौकीदार भी इस पर ध्यान नहीं दे रहे. वहीं सबसे गंभीर बात यह है कि जिम्मेदार अधिकारी समस्याओं पर ठोस कार्रवाई करने के बजाय केवल आश्वासन देते नजर आ रहे हैं.
5 साल में हजारों पक्षियों से सैकड़ों तक पहुंचा सिरपुर
आर्निथोलॉजिस्टऔर रिसर्चर रितेश खेड़ा के अनुसार, सिरपुर तालाब की स्थिति पिछले पांच वर्षों में तेजी से खराब हुई है. उन्होंने बताया कि पहले यहां हजारों की संख्या में प्रवासी और स्थानीय पक्षी आते थे, जो अब घट रहे हैं.
उनके मुताबिक तालाब में मिल रहे गंदे पानी और ह्यूमन वेस्ट के कारण फॉस्फोरस और नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ी है, जिससे जलकुंभी तेजी से फैल रही है. छोटा सिरपुर तालाब लगभग पूरी तरह जलकुंभी से ढक चुका है.
उन्होंने कहा कि यदि तीन दिन तक जलकुंभी नहीं हटाई जाए तो समस्या कई गुना बढ़ जाती है. फ्लाईकैचर, बाज और हैरियर जैसे शिकारी पक्षी यहां लगभग दिखाई देना बंद हो चुके हैं.
सौंदर्यीकरण हुआ, संरक्षण नहीं
रितेश खेड़ा ने यह भी कहा कि अधिकारियों ने तालाब का केवल सौंदर्यीकरण किया, लेकिन संरक्षण के लिए विशेषज्ञों को शामिल नहीं किया गया. तालाब के आसपास बड़े पैमाने पर सीमेंटकरण होने से पक्षियों की नेस्टिंग प्रभावित हुई है. बिना विशेषज्ञ सलाह के किए गए वृक्षारोपण में ऐसे पौधे लगाए गए जो पक्षियों के अनुकूल नहीं हैं. उन्होंने बताया कि यहां प्राकृतिक प्रजातियों के पौधे लगाए जाने चाहिए थे ताकि पक्षियों का प्राकृतिक आवास विकसित हो सके.
पक्षियों के नाम पर दाना डालना बना खतरा
तालाब पर आने वाले लोग पक्षियों के लिए बड़ी मात्रा में दाना डाल जाते हैं, जिससे यहां चूहों की संख्या तेजी से बढ़ी है. चूहों ने पेड़ों की जड़ों और पाल को खोखला करना शुरू कर दिया है. विशेषज्ञों के अनुसार इससे भविष्य में तालाब की संरचना भी कमजोर हो सकती है. साथ ही, यहां नशेड़ियों की गतिविधियों और सुरक्षा की कमी के कारण बर्ड वॉचर्स और आम लोग भी आने से हिचकने लगे हैं.
वेटलैंड का प्राकृतिक स्वरूप पर खतरा
पर्यावरण विशेषज्ञ संदीप खांडवैलकर के अनुसार, वेटलैंड वह क्षेत्र होता है जहां नम भूमि, प्राकृतिक वनस्पति और छोटे पौधे पक्षियों को सुरक्षित आवास उपलब्ध कराते हैं. लेकिन सिरपुर में कैचमेंट एरिया पर लगातार अतिक्रमण होने से तालाब की प्राकृतिक संरचना खत्म होती जा रही है. उन्होंने कहा कि जलकुंभी की सबसे बड़ी वजह गंदे पानी की आवक है. अमोनिया और नाइट्रेट की अधिकता के कारण यह तेजी से फैलती है, जिससे पानी में ऑक्सीजन कम हो जाती है और जलीय जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है. विशेषज्ञों ने तालाब के आसपास लेमनग्रास, खस, वाटर बंबू और अन्य प्राकृतिक पौधे लगाने, फव्वारे चालू करने और नेचर-बेस्ड सॉल्यूशन अपनाने की जरूरत बताई है.
वेटलैंड समिति सदस्य ने चेताया
चित्र- दिलीप वाघेला
जिला वेटलैंड संरक्षण समिति के विशेषज्ञ सदस्य डॉ. दिलीप वाघेला ने बताया कि पिपलियापाला, सिरपुर और बिलावली जलाशयों में कई स्थानों पर सीवेज मिश्रण और इनलेट चैनलों पर अतिक्रमण गंभीर पर्यावरणीय खतरा बन चुके हैं. उन्होंने कहा कि यदि समय रहते सीवेज डायवर्जन, डी-सिल्टिंग और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं हुई तो जल गुणवत्ता, जैव विविधता और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है.
निगम का जवाब जल्द करेंगे कार्रवाई
मामले में जब एडिशनल कमिश्नर नगर निगम एवं स्मार्ट सिटी सीईओ अर्थ जैन से चर्चा की गई तो उन्होंने सुरक्षा जाली और लाइट व्यवस्था जांचने तथा सुधार के निर्देश देने की बात कही. उन्होंने माना कि तालाब में अनट्रीटेड पानी नहीं जाना चाहिए और जलकुंभी बड़ी समस्या बन चुकी है. निगम द्वारा एक मशीन लगाने की बात भी कही गई, हालांकि अधिकारियों ने यह भी स्वीकार किया कि इससे पूरी समस्या का समाधान संभव नहीं है. अतिक्रमण हटाने और गंदे पानी की आवक रोकने को लेकर भी जल्द कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है.
सवाल वही- आखिर जिम्मेदार कौन?
वेटलैंड घोषित होने के बाद भी यदि तालाब गंदगी, जलकुंभी, सीवेज और अव्यवस्थाओं से घिरा रहे, पक्षी पलायन करने लगें और सुरक्षा व्यवस्था तक ध्वस्त हो जाए, तो सवाल सीधे जिम्मेदार एजेंसियों पर खड़े होते हैं. सिरपुर तालाब फिलहाल संरक्षण से ज्यादा लापरवाही का उदाहरण बनता दिखाई दे रहा है.
