सतना : जिले की महत्वाकांक्षी 1872 करोड़ की बहुउद्देश्यीय बाणसागर नल जल परियोजना वर्तमान वर्तमान में आर्थिक संकटो से जूझ रही है. गुणवत्ता निगरानी के लिए तैनात एजेंसियों के कमर्चारी अधिकारियों को पिछले छह महीने से वेतन व भत्ते के बिना काम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो जल निगम के अंतर्गत संचालित इस परियोजना में गुणवत्ता की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।भारत सरकार का उपक्रम वापकोस लिमिटेड पूर्ण स्वामित्व वाला एक केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है ,जल निगम और वापकोस लिमिटेड इस परियोजना का कार्य करा रहे हैं .
परियोजना के क्रियान्वयन का जिम्मा केईसी कंपनी के पास है. इस परियोजना की निगरानी के लिए जल निगम और वाप्कोस की सहमति गुणवत्ता निगरानी के लिए दो प्रमुख एजेन्सी थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन और एसक्यूसी एजेंसी को अनुबंधित किया गया है. परियोजना के कार्यों की निगरानी पहले एसक्यूसी एजेंसी करती है फिर इसकी निगरानी के लिए थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन करती हैंमिली जानकारी के अनुसार इन कम्पनियों के इंजीनियर्स पिछले सात महीनों से वेतन न मिलने के कारण साइट पर नहीं जा रहे हैं। आलम यह है कि पेट्रोल और वाहनों के अभाव में अब ऑफिस में बैठकर ही मोबाइल के जरिए आरएफआई बंद करवाई जा रही है।
जब निर्माण कार्य की निगरानी करने वाले विशेषज्ञ ही मौके पर मौजूद नहीं हैं, तो कार्य की गुणवत्ता का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। केईसी कंपनी द्वारा कई बार बिना इंजीनियर्स को सूचित किए टंकियों की कास्टिंग (ढलाई) कर दी गई। इस गंभीर विषय पर टीम लीडर को सूचित करने के बावजूद ठेकेदार कंपनी पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जो मिलीभगत की ओर इशारा करती है।उल्लेखनीय है कि जल जीवन मिशन का बाणसागगर 2 समूह 2023 में प्रारंभ हुआ, जिसमें सोहावल विकासखंड के सोहावल, मझगवां और नागौद ब्लॉक के 725 गांवों तथा रीवा जिले के दो ब्लॉकों के 210 गांवों को शामिल किया गया है। यह परियोजना का क्रियान्वयन केईसी कंपनी द्वारा की जा रही है और इसे मार्च 2027 तक पूर्ण करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस चरण में इंटेकवेल और फिल्टर प्लांट का निर्माण कार्य दिसंबर 2026 तक पूर्ण होने की संभावना है।
पिछले 20 महीनों से जल निगम की दोनों एजेंसियों के पास स्वीकृत पदों के मुकाबले 50 प्रतिशत से भी कम स्टाफ है। संसाधनों और मैनपावर की इस भारी कमी के बीच 1872 करोड़ रुपये का काम केवल कागजों और फोन कॉल्स तक सीमित होकर रह गया है।इस ओर न जल निगम ध्यान दे रहा न ही भारत सरकार के उपक्रम वापकोस की इस ओर किसी प्रकार की निगाह है. इस संदर्भ में परियोजना के महाप्रबंधक से संपर्क का प्रयास किया गया पर वो उपलब्ध नही हो सके
