अध्यात्म का सूर्य है श्रीमद्भागवत, इसके श्रवण से मिटता है अज्ञान का अंधकार

भौंरा। कछार ग्राम में चित्रकूट से आए नितिन देव महाराज ज्ञान और वैराग्य के प्रतिमूर्ति हैं। उनकी ओजस्वी वाणी में साक्षात् सरस्वती का वास है, जो श्रोताओं के हृदय में भक्ति का बीजारोपण करती है। वे न केवल शास्त्रों के मर्मज्ञ हैं, बल्कि सरल व्याख्या के माध्यम से अध्यात्म को जन-जन तक पहुँचाने में सिद्धहस्त हैं। उनका सौम्य व्यक्तित्व और मुखमंडल की आभा उनकी गहरी तपस्या और ईश्वरीय निष्ठा का जीवंत प्रमाण है। उनके सानिध्य में कथा श्रवण करना किसी आध्यात्मिक उत्सव से कम नहीं है।

कथा के पंचम सोपान पर भगवान श्रीकृष्ण की चित्तचोर बाल लीलाओं का अत्यंत मनोहारी चित्रण किया गया। यशोदा नंदन की माखन चोरी और सखाओं संग क्रीड़ा के प्रसंगों ने संपूर्ण पंडाल को गोकुल के आनंद में सराबोर कर दिया। महाराज जी ने बताया कि प्रभु की प्रत्येक चेष्टा भक्त के अहंकार को नष्ट करने और निश्छल प्रेम जगाने का माध्यम है। नन्हे कान्हा के वात्सल्य रस में डूबे इन प्रसंगों ने भक्तों की आँखों को भावुकता के अश्रुओं से नम कर दिया। बाल लीलाओं का यह क्रम जीव को ईश्वर की सुलभता और उनकी करुणा का दिव्य बोध कराता है।

इंद्र के मान-मर्दन और प्रकृति पूजन का संदेश देती ‘गोवर्धन लीला’ का प्रसंग अतीव प्रेरणादायी रहा। भगवान द्वारा कनिष्ठ उंगली पर गिरिराज को धारण करना इस सत्य को रेखांकित करता है कि जब समाज संगठित होता है, तो प्रभु स्वयं उसकी रक्षा का भार उठा लेते हैं। यह लीला केवल एक चमत्कार नहीं, अपितु पर्यावरण संरक्षण और सामूहिकता के महत्व का विजयघोष है।

महाराज के कंठ से प्रस्फुटित होते मधुर भजनों ने वातावरण में भक्ति का अनूठा रस घोल दिया। उनके द्वारा गाए गए कर्णप्रिय गीतों पर श्रोता आत्मविभोर होकर झूम उठे, जिससे संपूर्ण परिसर वैकुंठ के सदृश प्रतीत होने लगा।

समारोह में उपस्थित समाजसेवी श्री सुरेश राठौड़ ने श्रीमद्भागवत को जीवन के अंधकार को मिटाने वाला ‘अध्यात्म-सूर्य’ बताया। उन्होंने कहा कि भागवत मात्र कथा नहीं, बल्कि मानव जीवन की आचार संहिता है जो हमें कर्तव्य पथ पर बढ़ने की प्रेरणा देती है। उनके अनुसार, ऐसे आयोजन समाज में नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना और पारस्परिक सद्भाव को सुदृढ़ करने में महती भूमिका निभाते हैं। उन्होंने युवाओं से इस ज्ञान को आत्मसात कर आदर्श समाज के निर्माण का आह्वान किया।ग्राम भौंरा से पधारे प्रबुद्धजनों अशोक जायसवाल, श्याम लाल राय, रमेश मालवीय, विष्णु मालवीय, जनक लाल पवार, राधे लाल राय एवं हरिओम मालवी ने महाराज जी की वाचन शैली की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। उन्होंने इस आयोजन को क्षेत्र की आध्यात्मिक चेतना के पुनर्जागरण का कालखंड बताया। उनके अनुसार, महाराज जी का प्रवाहपूर्ण व्याख्यान हृदय को सीधे स्पर्श करने वाला और अत्यंत वंदनीय है।

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