बेंगलुरु, 04 मई (वार्ता) कर्नाटक के दावणगेरे दक्षिण और बागलकोट विधानसभा उपचुनावों के नतीजों ने कांग्रेस के लिए क्लीन स्वीप का रास्ता साफ कर दिया है। सोमवार को आए इन परिणामों में सत्ताधारी दल ने दोनों सीटों पर जीत हासिल कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को बड़ा राजनीतिक झटका दिया है।
इन नतीजों से हालांकि सिद्दारमैया सरकार के आंकड़ों पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन इनका राजनीतिक महत्व बहुत ज्यादा है। यह जीत दर्शाती है कि जहाँ एक ओर कांग्रेस सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही है, वहीं भाजपा 2023 की विधानसभा हार के बाद अब भी वापसी के लिए संघर्ष कर रही है।
कांग्रेस के लिए यह दोहरी जीत उसके इस दावे को पुख्ता करती है कि जनकल्याणकारी योजनाएं और ‘गारंटी मॉडल’ अब भी मतदाताओं के बीच लोकप्रिय है। इससे यह भी साफ होता है कि पार्टी ने न केवल सत्ता संभाली है, बल्कि राज्य की प्रतिस्पर्धी राजनीति में अपनी बढ़त भी बरकरार रखी है।
इसके अलावा, यह जीत श्री सिद्दारमैया और डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व में संगठनात्मक एकजुटता को भी दर्शाती है, जिस पर भाजपा अक्सर सवाल उठाती रही है।
दूसरी ओर, भाजपा के लिए ये नतीजे 2023 के बाद दोबारा खड़े होने की उसकी कोशिशों के लिए एक बड़ा धक्का हैं। दोनों सीटों पर मिली हार ने पार्टी की सांगठनिक दिशा और नेतृत्व की प्रभावशीलता पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
दावणगेरे दक्षिण में कांग्रेस की सफलता बताती है कि उसका शहरी और मिला-जुला सामाजिक गठबंधन अब भी अटूट है। वहीं बागलकोट में भाजपा की हार उसके लिए और भी चिंताजनक है, क्योंकि उत्तर कर्नाटक का यह क्षेत्र पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। इससे संकेत मिलता है कि अब केवल पारंपरिक जातिगत समीकरण ही जीत की गारंटी नहीं हैं, बल्कि कल्याणकारी योजनाएं मतदाताओं के व्यवहार को बदल रही हैं।
श्री सिद्दारमैया के लिए यह फैसला उनके शासन मॉडल पर जनता की मुहर की तरह है। इससे पार्टी के भीतर उनकी स्थिति और मजबूत होगी। इसके साथ ही, उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को भी जमीनी स्तर पर चुनावी मशीनरी को सक्रिय करने और बेहतर समन्वय का श्रेय मिलेगा।
ये उपचुनाव नतीजे कुल मिलाकर, कर्नाटक की वर्तमान राजनीति में कांग्रेस की मजबूती और भाजपा की रणनीतिक विफलता को उजागर करते हैं। इन परिणामों से राज्य में भाजपा के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर आत्ममंथन का दौर शुरू होने की संभावना है।
