भारत-यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौता

अठारह वर्षों की लंबी कूटनीतिक प्रतीक्षा, असंख्य दौर की वार्ताओं और बदलते वैश्विक समीकरणों के बाद मंगलवार को भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते का संपन्न होना केवल एक आर्थिक घटना नहीं है, बल्कि इक्कीसवीं सदी की वैश्विक शक्ति-संतुलन राजनीति में एक निर्णायक मोड़ भी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन द्वारा इसे मदर आफ आल डील (सभी समझौतों की जननी ) कहा जाना, इस समझौते की व्यापकता और दूरगामी प्रभावों को स्पष्ट करता है. यह समझौता विश्व की दो बड़ी लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्थाओं को एक साझा आर्थिक मंच पर लाता है, जो संयुक्त रूप से वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग पच्चीस प्रतिशत और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का लगभग एक-तिहाई भाग नियंत्रित करती हैं. लगभग दो अरब लोगों के बाज़ार को जोडऩे वाला यह मुक्त व्यापार क्षेत्र न केवल व्यापारिक बाधाओं को समाप्त करता है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को नए सिरे से परिभाषित करने की क्षमता भी रखता है. आर्थिक दृष्टि से यह समझौता भारत के लिए उपभोक्ता हित और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा,दोनों के नए द्वार खोलता है. यूरोपीय संघ से आयातित उत्पादों पर सीमा शुल्क में भारी कटौती का अर्थ यह है कि भारत के बाज़ार में विलासितापूर्ण वाहन, अंगूर-मदिरा, उच्च गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थ, चिकित्सा उपकरण तथा अत्याधुनिक औद्योगिक मशीनें पहले की तुलना में अधिक सुलभ होंगी. वाहनों पर लगने वाले अत्यधिक आयात शुल्क का एक अंकीय (सिंगल डिजिट) स्तर तक सिमटना तथा मदिरा पर शुल्क में चरणबद्ध कमी, उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति को नई गति प्रदान करेगी. दरअसल,इस समझौते की वास्तविक शक्ति केवल सस्ते आयात तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के निर्यात पक्ष में निहित है. वस्त्र, चमड़ा, रत्न एवं आभूषण तथा समुद्री उत्पाद जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को यूरोपीय बाज़ारों में शुल्क-मुक्त प्रवेश मिलना, भारत में रोजग़ार सृजन और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के विस्तार का बड़ा अवसर है. यह पहल ‘मेक इन इंडिया’ को मात्र नारा न रहकर वैश्विक व्यापार का व्यावहारिक मॉडल बनाने की दिशा में ठोस कदम सिद्ध होती है. सर्विस सेक्टर में भी यह समझौता भारत के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक लाभ लेकर आया है. सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों, अभियंताओं और वित्तीय सलाहकारों के लिए यूरोप में सेवाएं देना सरल होना, भारत की मानव पूंजी को वैश्विक मान्यता दिलाने वाला कदम है. इसके साथ ही विनिर्माण, बुनियादी ढांचे और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में संभावित यूरोपीय निवेश, भारत की दीर्घकालिक विकास यात्रा को स्थायित्व प्रदान करेगा. दरअसल,रणनीतिक स्तर पर यह समझौता चीन-केंद्रित वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के विकल्प के रूप में भारत को स्थापित करता है. जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए यूरोपीय संघ द्वारा हरित प्रौद्योगिकी सहयोग और आर्थिक सहायता, भारत की सतत विकास संबंधी प्रतिबद्धताओं को मजबूती प्रदान करती है तथा हरित विकास को आर्थिक नीति के केंद्र में स्थापित करती है.

निस्संदेह, इस समझौते के क्रियान्वयन के दौरान घरेलू उद्योगों की सुरक्षा, कृषि हितों की रक्षा और नियामक संतुलन जैसी चुनौतियाँ सामने आएंगी. किंतु दीर्घकाल में यह मुक्त व्यापार समझौता भारत को एक विश्वसनीय और प्रभावशाली वैश्विक आर्थिक साझेदार के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखता है.

यदि संसदों की स्वीकृति समयबद्ध रूप से प्राप्त होती है और नीति-स्तर पर सतर्कता बनी रहती है, तो वर्ष 2027 तक लागू होने वाला यह समझौता भारत की आर्थिक यात्रा में एक नया अध्याय जोड़ेगा,जहां व्यापार केवल लेन-देन का माध्यम नहीं रहेगा, बल्कि रणनीति, आत्मविश्वास और वैश्विक नेतृत्व का प्रतीक बनेगा.

 

 

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