हैदराबाद | भारतीय सिनेमा के इतिहास को बदलने वाली फिल्म ‘बाहुबली 2: द कन्क्लूजन’ की वर्षगांठ पर आज भी प्रभास का जादू बरकरार है। अमरेंद्र बाहुबली के रूप में उनकी एंट्री, जहां वे एक बेकाबू हाथी को शांत करते हैं, उनकी शक्ति और दयालुता का अनूठा संगम थी। कुंतला देश की रक्षा के लिए भेष बदलकर पिंडारियों से लड़ना और युद्ध के बीच अपना असली कवच दिखाना दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देने वाला पल था। प्रभास ने केवल अपनी कद-काठी से नहीं, बल्कि राजदरबार में गलत करने वाले का सिर काटकर दिए गए ‘बाहुबली के इंसाफ’ जैसे दृश्यों से अभिनय की एक नई ऊंचाई छुई, जिसने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बना दिया।
प्रभास ने फिल्म में वीरता के साथ-साथ संवेदनशीलता को भी बखूबी जिया। देवसेना को एक साथ तीन तीर चलाना सिखाने के दौरान उनका रोमांटिक अंदाज और नाव वाले दृश्य में खुद को झुकाकर देवसेना को रास्ता देना, महिलाओं के प्रति उनके गहरे सम्मान को दर्शाता है। अपनी माँ शिवगामी के खिलाफ जाकर सत्य और देवसेना का साथ देना यह साबित करता है कि बाहुबली के लिए सिंहासन से बड़ा न्याय और नैतिकता थी। धोखे से घायल होने के बाद भी एक राजा की तरह बैठे-बैठे प्राण त्यागने के उनके अभिनय ने दर्शकों को भावुक कर दिया और यह सीन सिनेमाई इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।
बाप के साथ-साथ बेटे (महेंद्र बाहुबली) के रूप में भी प्रभास ने गजब की स्फूर्ति दिखाई। ताड़ के पेड़ को गुलेल बनाकर किले में घुसने का उनका अनोखा आइडिया आज भी फैंस का पसंदीदा है। फिल्म के अंत में जब भल्लालदेव उन्हें पस्त करने की कोशिश करता है, तब शिवलिंग के पास से शक्ति जुटाकर दोबारा खड़े होना बुराई पर अच्छाई की जीत का सबसे बड़ा प्रतीक बना। ‘बाहुबली’ की इस अपार सफलता ने प्रभास को सिर्फ एक अभिनेता नहीं बल्कि एक ‘ब्रांड’ बना दिया, जिसने भाषाई सीमाओं को तोड़कर दक्षिण भारतीय सिनेमा को वैश्विक पहचान दिलाई।

